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वेदान्त 2.0 Life — जीवन के विरुद्ध नहीं, जीवन के साथ ✧


मनुष्य जीवन को बदलना चाहता है,
जबकि प्रकृति हर क्षण तुम्हारा जीवन बदल रही है।
इसी परिवर्तन को न समझ पाने से
मनुष्य दुःख और भ्रम में पड़ जाता है।
मनुष्य को वह जीवन नहीं चाहिए जो उसे मिला है—
उसे वह जीवन चाहिए जो दूसरे के पास है।
यहीं से तुलना जन्म लेती है,
और तुलना से दुःख।
एक ही जाति, एक ही वर्ग,
एक ही परिवार में जन्म—
शिक्षा भी एक जैसी।
फिर भी जीवन-आयु समान नहीं होती।
किसी का जीवन बचपन की अवस्था में है,
किसी का यौवन में,
किसी का वृद्धावस्था में।
जो बचपन में है, वह युवा होना चाहता है।
जो युवा है, वह कुछ और बनना चाहता है।
जो वृद्ध है, वह पीछे लौटना चाहता है।
यह असंभव इच्छा ही दुःख है।
और यह दुःख अनुचित नहीं—
यह मिलना चाहिए।
प्रकृति देती है, क्योंकि यही उसका नियम है।
यहाँ कोई अमीर-गरीब नहीं,
कोई राजा-भिखारी नहीं—
यह सब जीवन की अवस्थाएँ हैं।
बच्चे को बच्चे जैसी सुविधा मिलती है।
वृद्ध को वृद्ध जैसी।
पर मनुष्य देखता है—
“कल मेरे साथ जन्मा था,
आज वह आगे है, मैं पीछे।”
यहीं दुःख पैदा होता है।
तुम अपनी अवस्था को नहीं देखते,
तुम दूसरे का सुख देखते हो।
तुम पद देखते हो, धन देखते हो।
तुम नहीं देखते कि
वह जीवन की किस अवस्था में खड़ा है।
प्रकृति जन्म की तारीख नहीं देखती—
प्रकृति मानवीय जीवन-आयु देती है।
धर्म ने, पाखंड ने,
ईश्वर, पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक की बातें करके
तुम्हें यह नहीं सिखाया
कि तुम्हारी मानवीय उम्र क्या है।
पूछो किसी गुरु से—
वह चकित हो जाएगा।
गुरु बनना भूल जाएगा,
ज्ञान देना भूल जाएगा।
पर तुम प्रश्न नहीं करते।
डर बिठा दिया गया है।
भय सिखाया गया है।
तुम्हें सिखाया गया है कि
तुम दुःख देखने के लिए पैदा हुए हो।
जागते ही गुरु गिर जाते हैं।
धर्म ढह जाता है।
कोई सत्ता, कोई बुद्धिजीवी
तुम्हें जागरूक नहीं करना चाहता।
क्योंकि जागा हुआ मनुष्य
राजा नहीं बनता,
गुरु नहीं बनता,
मोटिवेशन बेचने वाला नहीं बनता।
जिसे जीना नहीं आता,
वह कुछ भी बन जाता है—
गुरु, नेता, संत, वैज्ञानिक, मंत्री।
जिसके पास धन और पद है,
उसने जीवन न जी पाने का
एक रास्ता खोज लिया है।
फिर वही तुम्हें सिखाता है—
“सफल बनो,
वीर बनो,
मेडल लाओ,
नाम रोशन करो।”
इस दौड़ में
जीवन का गला घोंट दिया गया।
जो जीवन को जी रहा है,
वह केवल
स्वतंत्रता,
आनंद,
शांति और प्रेम की बात करेगा।
वह तुम्हें कुछ पाने को नहीं कहेगा।
वह तुम्हें ईश्वर, गुरु, धर्म से भी दूर कर देगा।
वह वृक्ष की ओर संकेत करेगा।
नदी की ओर।
पर्वत की ओर।
कहेगा—
यही जीवन है।
पूजना नहीं है—
सीखना है।
सीखना है कि
जीवन कैसे बह रहा है।
जो तुम्हें दिया जा रहा है—
सारी साधनाएँ,
सारी सुविधाएँ,
सारी विचारधाराएँ—
अधिकतर जीवन-विरोधी हैं।
आनंद-विरोधी हैं।
प्रेम-विरोधी हैं।
क्योंकि जो स्वयं जीवन से भाग रहा है,
वह तुम्हें क्या देगा?
जो कहते हैं—
“ईश्वर मिलेगा”,
उनसे पूछो—
तुम्हारे पास है?
तुम आनंद में हो?
तुम शांति में हो?
ऊपर उठा हुआ जीवन
कुछ देता नहीं।
वह केवल संकेत करता है।
जीवन को रोका नहीं जा सकता।
उसे समझा जा सकता है।
मौन में जाना भी एक दमन हो सकता है।
पर मौन को समझना—
यह जीवन का द्वार है।
कोई साधना नहीं दूँगा।
कोई मार्ग नहीं।
केवल एक मामूली संकेत।
अगर तुम्हारे भीतर
जीने की प्यास है—
तो वही प्यास
तुम्हें जीवन देगी।
और जब तुम जीने लगोगे—
दुनिया की सारी उपलब्धियाँ
अपने आप गिर जाएँगी।
जीवन का बहाव
अलौकिक है।
अद्भुत है।
उसका कोई ज्ञान नहीं।
वह केवल आनंद है।
शब्दों से परे।
दृश्य से परे।
मौन में—
पर मौन नहीं।
वेदान्त 2.0 Life

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