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आँखें खोल देने वाली गाथा: जब एक महान सम्राट ने जाना जीवन का सबसे बड़ा सत्य* *यह कथा है महाराज ययाति की, जो राजा नहुष के पुत्र थे। वे अत्यंत पराक्रमी, धर्मनिष्ठ और प्रजापालक सम्राट थे* *उनका विवाह महर्षि शुक्राचार्य की कन्या देवयानी से हुआ था, और दैत्यराज की पुत्री शर्मिष्ठा भी उनकी दूसरी पत्नी बनीं* *श्राप और बुढ़ापा* *एक भूल के कारण, महर्षि शुक्राचार्य ने क्रोधित होकर राजा ययाति को जवानी में ही तत्काल बूढ़ा होने का श्राप दे दिया। ययाति के बहुत अनुनय-विनय करने पर शुक्राचार्य ने श्राप-मुक्ति का एक उपाय बताया* "यदि तुम्हारा कोई पुत्र अपना यौवन देकर तुम्हारा बुढ़ापा ले ले, तो तुम पुनः जवान हो सकते हो।" पुत्र का त्याग: महाराज ने अपने बड़े पुत्रों (यदु, तुर्वसु, अनु, द्रुह्य) से यौवन माँगा, पर सबने अस्वीकार कर दिया। अंत में, शर्मिष्ठा के सबसे छोटे पुत्र 'पुरु' ने पिता का बुढ़ापा सहर्ष स्वीकार कर लिया और अपनी जवानी उन्हें दे दी। प्रसन्न होकर पिता ने पुरु को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। आत्मज्ञान की प्राप्ति (The Realization): पुनः युवा होकर महाराज ययाति वर्षों तक भोग-विलास में लिप्त रहे। लेकिन अंततः, भगवान की कृपा से उनकी आँखें खुलीं और उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्हें समझ आया कि वासना की आग कभी बुझती नहीं है। उन्होंने संसार को यह अमूल्य सीख दी: "काम (इच्छाओं) की तृष्णा उपभोग से कभी कम नहीं होती, बल्कि और बढ़ती ही जाती है। ठीक वैसे ही, जैसे आग में घी डालने से उसकी लपटें और भड़कती हैं।" "पृथ्वी का समस्त धन-धान्य और सुख-सुविधाएं भी एक व्यक्ति की तृष्णा को शांत करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।" सार: मनुष्य का शरीर बूढ़ा हो जाता है—केश, दाँत, सब जीर्ण हो जाते हैं—किंतु 'तृष्णा' मरते दम तक जीर्ण नहीं होती। सच्चा सुख तो मनुष्य के लिए सनातन धर्म ग्रंथों के पीछे भागने से नहीं, बल्कि इंद्रियों को नियंत्रण और मन को परमात्मा में ध्यान लगाने में है। और अपने परिवार परिजनों की सेवा भाव निरंतर करते रहना चाहिए धन्यवाद (स्रोत: लिंगपुराण) दोस्तो = यह कथा आज के भौतिकवादी युग में अत्यंत अप्रासंगिक है और सामाजिक प्रतिभूति व्यवस्था के सुधार में शामिल है


*आँखें खोल देने वाली गाथा: जब एक महान सम्राट ने जाना जीवन का सबसे बड़ा सत्य*

*यह कथा है महाराज ययाति की, जो राजा नहुष के पुत्र थे। वे अत्यंत पराक्रमी, धर्मनिष्ठ और प्रजापालक सम्राट थे*
*उनका विवाह महर्षि शुक्राचार्य की कन्या देवयानी से हुआ था, और दैत्यराज की पुत्री शर्मिष्ठा भी उनकी दूसरी पत्नी बनीं*

*श्राप और बुढ़ापा*
*एक भूल के कारण, महर्षि शुक्राचार्य ने क्रोधित होकर राजा ययाति को जवानी में ही तत्काल बूढ़ा होने का श्राप दे दिया। ययाति के बहुत अनुनय-विनय करने पर शुक्राचार्य ने श्राप-मुक्ति का एक उपाय बताया*
"यदि तुम्हारा कोई पुत्र अपना यौवन देकर तुम्हारा बुढ़ापा ले ले, तो तुम पुनः जवान हो सकते हो।"

पुत्र का त्याग:
महाराज ने अपने बड़े पुत्रों (यदु, तुर्वसु, अनु, द्रुह्य) से यौवन माँगा, पर सबने अस्वीकार कर दिया। अंत में, शर्मिष्ठा के सबसे छोटे पुत्र 'पुरु' ने पिता का बुढ़ापा सहर्ष स्वीकार कर लिया और अपनी जवानी उन्हें दे दी।
प्रसन्न होकर पिता ने पुरु को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

आत्मज्ञान की प्राप्ति (The Realization):
पुनः युवा होकर महाराज ययाति वर्षों तक भोग-विलास में लिप्त रहे। लेकिन अंततः, भगवान की कृपा से उनकी आँखें खुलीं और उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ।
उन्हें समझ आया कि वासना की आग कभी बुझती नहीं है।
उन्होंने संसार को यह अमूल्य सीख दी:

"काम (इच्छाओं) की तृष्णा उपभोग से कभी कम नहीं होती, बल्कि और बढ़ती ही जाती है। ठीक वैसे ही, जैसे आग में घी डालने से उसकी लपटें और भड़कती हैं।"

"पृथ्वी का समस्त धन-धान्य और सुख-सुविधाएं भी एक व्यक्ति की तृष्णा को शांत करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।"

सार:
मनुष्य का शरीर बूढ़ा हो जाता है—केश, दाँत, सब जीर्ण हो जाते हैं—किंतु 'तृष्णा' मरते दम तक जीर्ण नहीं होती। सच्चा सुख तो मनुष्य के लिए सनातन धर्म ग्रंथों के पीछे भागने से नहीं, बल्कि इंद्रियों को नियंत्रण और मन को परमात्मा में ध्यान लगाने में है।
और अपने परिवार परिजनों की सेवा भाव निरंतर करते रहना चाहिए धन्यवाद

(स्रोत: लिंगपुराण)

दोस्तो = यह कथा आज के भौतिकवादी युग में अत्यंत अप्रासंगिक है और सामाजिक प्रतिभूति व्यवस्था के सुधार में शामिल है

कल आप पर बहुत विचार किया मैंने और आपका दिमाग का अनुकूलित और उसमें मेरे लिए पनाप रहे विचारों का आदान-प्रदान किया तो मैंने तो कोई भी खुराफात किया नहीं था लेकिन मैं मजबूर हुआ इस प्रकार की कहानियों का संकलन आपके सामने करने में सक्षम हुआ हू और ये कहानी धार्मिक ग्रंथों की सच्चाई से अवगत कराने में है और गलत मानसिकता सही करने में है लेकिन मैं इस प्रकार का बिल्कुल भी नहीं हू ना मेरी मानसिकता इस तरह की हैं सामाजिक जीवन में सुधारों में क्रियान्वयन करने में सक्षम हू धन्यावाद



🚨International human rights🚨
🚨sangathan.mantri🚨
🚨Shivam Kumar Asthana🚨

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