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*असम : छठी अनुसूची पर भाजपा-कॉर्पोरेट का हमला* *(आलेख : भूपेन सरमा, अनुवाद : संजय पराते)*





*प्रकाशनार्थ*

*असम : छठी अनुसूची पर भाजपा-कॉर्पोरेट का हमला*
*(आलेख : भूपेन सरमा, अनुवाद : संजय पराते)*

1826 में ब्रह्मपुत्र घाटी पर कब्ज़े के बाद, ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने धीरे-धीरे आस-पास की पहाड़ियों और मैदानों को अपने अधीन कर लिया और उन्हें असम के औपनिवेशिक प्रांत में मिला लिया। औपनिवेशिक प्रांत का इलाका काफी बढ़ाया गया, जिसमें 1830 में कछार मैदान, 1833 में खासी पहाड़ियाँ, 1835 में जयंतिया मैदान, मौजूदा कार्बी आंगलोंग और उत्तरी कछार के इलाके क्रमशः 1838 और 1854 में, 1866-1904 के दौरान नागा पहाड़ियाँ, 1872-73 में गारो पहाड़ियाँ और 1890 में लुशाई पहाड़ियाँ शामिल थीं। इसलिए, असम के औपनिवेशिक नक्शे में मणिपुर और त्रिपुरा की दो रियासतों को छोड़कर लगभग पूरा उत्तर-पूर्वी भारत शामिल था।

*औपनिवेशिक बहिष्कार*

बहरहाल, पहाड़ियों में औपनिवेशिक प्रशासन को मज़बूत करने की प्रक्रिया में, आदिवासी समाजों को बाकी औपनिवेशिक भारत, जिसमें असम के मैदान भी शामिल थे, के साथ किसी भी सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक एकीकरण से दूर रखने के सचेत प्रयास किए गए। प्रशासनिक उपाय मुख्य रूप से असम के मैदानों के प्राकृतिक संसाधनों का बेरहमी से शोषण सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए थे, और इस प्रक्रिया के साथ पहाड़ियों (आदिम और जंगली) और घाटियों (सभ्य) के बीच एक मानवशास्त्रीय विभाजन भी किया गया। सांस्कृतिक, राजनीतिक और प्रशासनिक विभाजन की शुरुआत 1873 के इनर लाइन रेगुलेशन से हुई और यह 1935 के भारत सरकार अधिनियम तक जारी रहा, जिसके बीच में कई अन्य उपायों से इसे और मज़बूत किया गया। भारत सरकार (बहिष्कृत और आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्र) आदेश, 1936 के बाद, वर्तमान अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिजोरम और उत्तरी कछार पहाड़ियों के भौगोलिक क्षेत्रों को बहिष्कृत क्षेत्रों के रूप में वर्गीकृत किया गया, और वर्तमान मेघालय राज्य और वर्तमान असम के कार्बी आंगलोंग जिले को आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्र की श्रेणी में रखा गया। प्रांतीय विधायिका की शक्तियाँ बहिष्कृत या आंशिक रूप से बहिष्कृत क्षेत्रों तक नहीं बढ़ाई गई थीं। इस तरह के बहिष्करण का सरल औपनिवेशिक तर्क यह था कि पहाड़ियों का झूमिया (झूम खेती करने वाले) समाज, जिनके पास उत्पादन के लगभग आदिम उपकरण और ज़मीन का सामुदायिक स्वामित्व था, औपनिवेशिक खजाने में शायद ही कोई अधिशेष दे सकते थे। यह स्पष्ट है कि असम की घाटियों में औपनिवेशिक पूंजी, श्रम और राजस्व को मज़बूत करना, औपनिवेशिक तर्क के लिए प्राथमिक चिंता थी, जिसके कारण वे आसपास की पहाड़ियों पर रहने वाले अनगिनत आदिवासी समुदायों को अपने स्वायत्त सामाजिक ढांचों के साथ मिलाना चाहते थे, जो उस औपनिवेशिक राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रति शत्रुतापूर्ण थे, जिसने मैदानों में गति पकड़ना शुरू कर दिया था।

औपनिवेशिक प्रशासन के बहिष्करण वाले उपायों ने पहाड़ों में अखिल भारतीय राष्ट्रवादी विचारों के प्रभाव को निश्चित रूप से सीमित कर दिया था। फिर भी, कई दूसरे कारकों ने -- जैसे बढ़ती साक्षरता, दूसरे विश्व युद्ध के दौरान और बाद में व्यापार और कारोबार के ज़रिए बाहरी लोगों से संपर्क, युद्ध के बाद पूर्व-सैनिकों का क्षेत्र से बाहर के अनुभव साथ लेकर लौटना, साथ ही पड़ोसी इलाकों में स्वतंत्रता आंदोलन का प्रभाव -- इन सबने पहाड़ों में राष्ट्रवाद के विकास में योगदान दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि अलग-अलग राजनीतिक संगठन सामने आए, खासकर 1930 के दशक के आखिर से। अपने रीति-रिवाजों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए स्वायत्तता और अपनी पहचान को मज़बूत करना, उनका साझा राजनीतिक एजेंडा था।

*छठी अनुसूची*

जब भारत आज़ादी की ओर बढ़ रहा था और बंटवारे के तर्क को स्वीकार कर रहा था, तो उभरते हुए राष्ट्र-राज्य की राजनीतिक तर्कसंगतता के लिए ज़रूरी था कि क्षेत्र में हो रहे राजनीतिक घटनाक्रमों को ध्यान में रखते हुए, सीमावर्ती इलाकों को एकीकृत करने के लिए एक अच्छी तरह से डिज़ाइन की गई पॉलिसी बनाई जाए। पहाड़ियों के राजनीतिक एकीकरण के संबंध में, सवाल यह था कि राजनीतिक स्वायत्तता की उनकी आकांक्षाओं को कैसे पूरा किया जाए। स्थिति की सही समझ बनाने की ज़रूरत को देखते हुए, 1947 में गोपीनाथ बोरदोलोई की अध्यक्षता में संविधान सभा की एक उप-समिति, जिसे उत्तर-पूर्वी सीमा (असम) जनजातीय और बहिष्कृत क्षेत्र उप-समिति कहा गया, का गठन किया गया। इस उप-समिति ने असम के पहाड़ी ज़िलों में गति पकड़ चुकी स्वायत्तता की राजनीतिक आकांक्षाओं को केंद्रीकृत आधार वाली राष्ट्रीय राजनीतिक प्रणाली में शामिल करने का प्रयास किया। एकीकरण का यह साधन संविधान सभा द्वारा पारित किया गया, जिससे संविधान की छठी अनुसूची बनी।

इसी के अनुसार, 1952 में यूनाइटेड खासी-जयंतिया हिल्स जिले, गारो हिल्स जिले, लुशाई (मिज़ो) हिल्स जिले में जिला परिषदों का गठन किया गया, और नॉर्थ कछार और मिकिर हिल्स जिलों, दोनों को मिलाकर एक प्रशासनिक जिला बनाया गया। इस व्यवस्था में असम के औपनिवेशिक नक्शे को बदले बिना, पहाड़ों और मैदानों का राजनीतिक और सांस्कृतिक एकीकरण करने की बात सोची गई थी। बहरहाल, जैसे-जैसे संवैधानिक व्यवस्था स्वायत्त जिलों के रूप में सामने आई, उभरते हुए नागा मध्यम वर्ग के राजनीतिक नेताओं की स्वायत्तता और नागा जीवन शैली की सुरक्षा की मांग को पूरा करना असंभव हो गया। असम के अन्य पहाड़ी जिलों में, भारतीय संविधान द्वारा दी गई स्वायत्तता एक स्वीकार्य प्रस्ताव था। बहरहाल, पहाड़ी क्षेत्रों के राजनीतिक नेताओं ने भारत के संघीय ढांचे के भीतर रहते हुए और अधिक शक्ति पाने के लिए प्रयास किया, और राज्य पुनर्गठन आयोग के गठन के बाद जिला परिषदों को मिलाकर अलग पहाड़ी राज्यों के लिए आंदोलन किया। अलग पहाड़ी राज्य के लिए आंदोलन को गारो, खासी और जयंतिया हिल्स में बहुत लोकप्रिय समर्थन मिला, जबकि अन्य जिला परिषदों के नेतृत्व ने जिला परिषद की संस्था को अधिक शक्तियां देना पसंद किया। 1960 के दशक की शुरुआत में मिज़ो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के सामने आने के साथ लुशाई हिल्स में राजनीतिक आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया, जिससे उसके पृथकतावादी मंसूबे साफ हो गए।

अलग-अलग पहाड़ी जनजातियों द्वारा, चाहे हिंसक हो या शांतिपूर्ण तरीकों से, राजनीतिक दावों के कारण, असम का राजनीतिक नक्शा फिर से बनाने की प्रक्रिया 1960 के दशक की शुरुआत से लेकर 1980 के दशक के मध्य तक जारी रही। नागालैंड 1962 में एक अलग राज्य बना, मेघालय को 1969 में असम से अलग किया गया, जबकि मिजोरम को 1986 में राज्य का दर्जा मिला। मिकिर और नॉर्थ कछार हिल्स जिलों को मेघालय में शामिल होने का विकल्प दिया गया था, लेकिन जिला परिषदों ने भारी बहुमत से असम के साथ रहने का फैसला किया। पहले असम के दो पहाड़ी जिलों, कार्बी आंगलोंग (पहले मिकिर हिल्स) और दिमा हसाओ (पहले नॉर्थ कछार हिल्स) का राजनीतिक नेतृत्व उन्हें दी गई स्वायत्तता से काफी हद तक संतुष्ट था, बाद में उन्होंने भी एक अलग राज्य की मांग शुरू कर दी। सशस्त्र उग्रवाद उनकी मुख्य रणनीति बन गई।

जब संविधान बनाया गया था, तो मैदानी जनजातियों को स्वायत्तता के किसी भी विचार से बाहर रखा गया था, यह मानकर कि वे संस्कृतिकरण की चल रही प्रक्रिया के ज़रिए बड़े असमिया समाज में घुल-मिल जायेंगे। बहरहाल, बड़े पैमाने पर आप्रवासन के बीच ज़मीन की सुरक्षा की उनकी माँग को आज़ादी के तुरंत बाद ट्राइबल बेल्ट और ब्लॉक बनाकर पूरा किया गया। फिर भी, जब अलग राज्य की उनकी माँग को सशस्त्र संघर्ष से मज़बूती मिली, तो उग्रवादियों के एक गुट को 2002 में बातचीत की मेज़ पर लाया गया, ताकि एक समझौता किया जा सके, जिसके परिणामस्वरूप संविधान की छठी अनुसूची के तहत बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) नामक एक स्वायत्त परिषद द्वारा शासित बोडोलैंड टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट्स का गठन हुआ।

छठी अनुसूची के प्रावधानों के तहत, स्वायत्त जिला परिषदों को विधायी, न्यायिक, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियां दी गई हैं। बहरहाल, संविधान द्वारा आदिवासी समाजों को दी गई स्वायत्तता का एक अनचाहा नतीजा यह हुआ कि एक छोटा-सा राजनीतिक गुट बन गया, जो राज्य की सुविधाओं का एक बड़ा हिस्सा हड़प रहा था। ज़ाहिर है, यह नया उभरता हुआ आदिवासी गुट केंद्र और राज्य दोनों में सत्ता में मौजूद बड़ी राजनीतिक ताकतों का स्वाभाविक सहयोगी बन गया।

*छठी अनुसूची का उल्लंघन*

अब भाजपा सरकार के करीबी सहयोगी होने के नाते, छठी अनुसूची के तहत गठित असम की सभी स्वायत्त जिला परिषदों का मौजूदा नेतृत्व कॉर्पोरेट घरानों के प्रति अपनी वफादारी दिखा रहा है। निर्देश के अनुसार, स्वायत्त परिषदों का राजनीतिक नेतृत्व अपनी विधायी शक्तियों का खुलेआम दुरुपयोग कर रहा है, जिसमें आरक्षित वन को छोड़कर, अन्य भूमि का आबंटन, कब्ज़ा या उपयोग और गैर-आरक्षित किसी भी जंगल का प्रबंधन शामिल है। एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ सालों में, कार्बी आंगलोंग में अंबानी समूह से जुड़ी एक परियोजना के लिए 6000 एकड़ ज़मीन आबंटित की जानी थी, जिससे अलग-अलग आदिवासी समुदायों के लगभग 20,000 लोग विस्थापित हो जाते। इसी तरह, कोकराझार ज़िले के परबतझोरा सब-डिवीजन में, अडानी समूह को एक थर्मल पावर प्लांट के लिए 1,134 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन आबंटित करने की भी कोशिश की गई। दीमा हसाओ ज़िले में भी यही स्थिति है। नॉर्थ कछार हिल्स स्वायत्त परिषद ने कोलकाता की एक निजी कंपनी को सीमेंट प्लांट लगाने के लिए कुल 3,000 बीघा ज़मीन (667 एकड़ से ज़्यादा) आबंटित की। ये सिर्फ़ कुछ उदाहरण हैं, जो कॉर्पोरेट घरानों के प्रति दिखाए गए प्यार और स्नेह को दर्शाते हैं, जबकि आम आदिवासियों के भूमि पर संवैधानिक अधिकारों को नज़रअंदाज़ किया गया है।

दिसंबर के तीसरे हफ़्ते (21-23 दिसंबर, 2025) में असम के वेस्ट कार्बी आंगलोंग ज़िले में भड़की राजनीतिक अशांति और हिंसा, हिंदुत्व की राजनीति का एक ऐसा नतीजा है, जिससे बचा नहीं जा सकता, जिसमें आम आदिवासी लोगों के संवैधानिक अधिकारों के प्रति असंवेदनशीलता साफ़-साफ़ दिखती है। अलग-अलग कॉर्पोरेट घरानों को ज़मीन के बड़े हिस्से के आबंटन के विरोध के साथ-साथ, आम आदिवासी लोग, खासकर वेस्ट कार्बी आंगलोंग ज़िले के लोग, उन गैर-आदिवासी लोगों को तुरंत हटाने की भी मांग कर रहे हैं, जिनमें से ज़्यादातर नोनिया समुदाय के वे लोग हैं, जो मूल रूप से बिहार के हैं, और जिन्होंने 1933 में व्यावसायिक चारागाह संरक्षित (प्रोफेशनल ग्रेज़िंग रिज़र्व) के तौर पर वर्गीकृत 11,000 बीघा से ज़्यादा ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया था। उनका आंदोलन तब और तेज़ हो गया, जब एक संगठन, रचनात्मक नोनिया संयुक्त संघ, जिसकी पीठ पर आरएसएस का हाथ होने का आरोप है, ने जनवरी 2024 में राष्ट्रपति के शिलांग दौरे के दौरान उन्हें एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें ज़मीन के पट्टे (ज़मीन का स्थाई मालिकाना हक) की मांग की गई थी, जो छठी अनुसूची की मूल भावना का उल्लंघन था। बहरहाल, राज्य और स्वायत्त परिषद दोनों जगह भाजपा लंबे समय से काबिज है, लेकिन उसने आज तक आम आदिवासी लोगों की बुनियादी चिंताओं के प्रति उदासीन रहना ही पसंद किया है, लेकिन जब दिसंबर में आंदोलन तेज़ हुआ, तो उसे बेरहमी से दबाने की कोशिश की है।

*(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)*

Devashish Govind Tokekar
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