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जिला बरेली का लगभग सबसे बड़ा गांव, लेकिन विकास योजनाओं का सबसे बड़ा शिकार

तरुण चहल बरेली संवाददाता ग्राम पंचायत गुरूगांवा मुस्तिकल (मझगवां, आँवला, बरेली जिला बरेली की सबसे बड़ी ग्राम पंचायतों में गिनी जाने वाली गुरूगांवा मुस्तिकल सात गांवों का समूह है। जनसंख्या, मतदाता संख्या और क्षेत्रफल के आधार पर यह पंचायत किसी कस्बे से कम नहीं, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण सत्य यह है कि यहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। यह स्थिति केवल लापरवाही नहीं, बल्कि योजनाबद्ध उपेक्षा और प्रशासनिक विफलता को दर्शाती है।सरकार हर मंच से “गांवों के सर्वांगीण विकास” का दावा करती है, लेकिन गुरूगांवा मुस्तिकल में ये दावे कागजों और फाइलों से आगे नहीं बढ़ पाए।

योजनाएं आईं, बजट आया, लेकिन गांव तक कुछ नहीं पहुंचा

आज गांव में
— ओपन जिम नहीं है, जबकि युवाओं को नशे से दूर रखने और स्वास्थ्य सुधार की बात की जाती है।
— अमृत सरोवर तालाब नहीं है, जबकि जल संरक्षण को लेकर करोड़ों रुपये खर्च होने का दावा किया जाता है।
— खेल मैदान नहीं है, जिससे बच्चों और युवाओं का भविष्य मैदान के बजाय सड़कों पर भटक रहा है।
— आंगनबाड़ी केंद्र उपलब्ध नहीं, जिससे गर्भवती महिलाएं और छोटे बच्चे पोषण योजनाओं से वंचित हैं।

यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि इतनी बड़ी ग्राम पंचायत में भी ये सुविधाएं नहीं हैं, तो योजनाओं का वास्तविक लाभ आखिर जा कहां रहा है?

हर घर नल योजना: नाम बड़ा, काम शून्य

गांव में पानी की टंकी और प्रभावी पाइपलाइन व्यवस्था का अभाव है। हर घर नल योजना के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति दिखाई देती है। ग्रामीण आज भी दूषित पानी पीने को मजबूर हैं, जिससे बीमारियों का खतरा लगातार बना रहता है।

स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त

ग्राम पंचायत में बना चिकित्सा उपकेंद्र खंडहर में तब्दील हो चुका है। न डॉक्टर, न स्टाफ, न दवाइयां। इलाज के लिए ग्रामीणों को दूर-दराज के कस्बों में जाना पड़ता है। आपात स्थिति में यह लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है।

स्वच्छता और सुरक्षा: सिर्फ नारे, जमीन पर सच्चाई शून्य

गांव में
— पर्याप्त सफाई कर्मचारी नहीं,
— सामुदायिक शौचालय खंडहर पड़ा है,
— सीसीटीवी कैमरों की कोई व्यवस्था नहीं।

स्वच्छ भारत और सुरक्षित गांव जैसे अभियानों की जमीनी हकीकत यहां पूरी तरह फेल नजर आती है।

महिला सशक्तिकरण योजनाएं भी दम तोड़ चुकी हैं

महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से चलाई गई
— स्वयं सहायता समूह योजनाएं निष्क्रिय हैं,
— बैंक सखी जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्था गांव में मौजूद नहीं।

जिससे महिलाएं आज भी बैंकिंग, ऋण और डिजिटल सेवाओं से वंचित हैं।

स्वामित्व योजना: अव्यवस्था और विवाद का दूसरा नाम

स्वामित्व योजना के तहत मिलने वाले संपत्ति कार्ड गांव में गंभीर अव्यवस्था का शिकार हैं।
कई परिवारों को आज तक कार्ड नहीं मिले,
कई में त्रुटियां हैं,
और कई मामलों में नए विवाद खड़े हो गए हैं।
यह योजना समाधान से ज्यादा समस्या बनती जा रही है।

*सवाल जो प्रशासन से पूछे जाने चाहिए*
— इतने बड़े गांव को विकास योजनाओं से वंचित क्यों रखा गया?
— जारी बजट और स्वीकृत योजनाओं की वास्तविक स्थिति क्या है?
— जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही कब तय होगी?
— ग्राम सभा की भूमिका केवल औपचारिक क्यों बना दी गई?

*ग्रामीणों की मांग*
ग्रामीण मांग करते हैं कि
— सभी योजनाओं का स्वतंत्र व निष्पक्ष सामाजिक ऑडिट कराया जाए।
— अधूरी और विफल योजनाओं की उच्च स्तरीय जांच हो।
— ग्राम पंचायत में विकास कार्यों की पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
— स्वास्थ्य, पानी, स्वच्छता और सुरक्षा को तत्काल प्राथमिकता दी जाए।

निष्कर्ष
यदि जिला बरेली की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत ही विकास के मामले में पिछड़ी हुई है, तो यह पूरे पंचायती राज तंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है। अब जरूरत दिखावे की नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की है।
ग्रामीण अब आश्वासन नहीं, जवाब और परिणाम चाहते हैं।

*लेखक- इंजी. विपिन सागर*
*ग्राम प्रधान प्रत्याशी*
*गुरूगांवा मुस्तिकल, मझगवां, बरेली*

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