logo

आप पढ़ें लिखें है समझदार हैं, सनातन में हजार गुरू नही थे, जिसकी पुजा जिसके आदेश पर हम चलते वे भीआज जैसे संस्था गुरू नहीं बने!

अध्याय : एक सत्ता, हज़ार गुरु — अव्यवस्था का धर्म

राज्य ने एक बात बहुत पहले समझ ली—

एक देश में दो प्रधानमंत्री नहीं हो सकते।

न ही दो राष्ट्रपति।
क्योंकि सत्ता अगर बँटती है,
तो ज़िम्मेदारी मिट जाती है।
राजनीति जानती है—
अधिक नेतृत्व = अधिक अराजकता।
इसलिए संविधान बना,
सीमाएँ तय हुईं,
कुर्सी तय हुई,
और यह भी तय हुआ कि
गलती होगी तो हटाया जाएगा।
अब धर्म को देखो।
धर्म में न संविधान है,
न सीमा,
न उत्तरदायित्व।
यहाँ एक नहीं—
हज़ारों धर्मगुरु हैं।
हर कोई अंतिम सत्य बोल रहा है,
हर कोई ईश्वर का प्रतिनिधि है,
हर कोई मोक्ष का ठेकेदार।
अगर एक देश में
हज़ार प्रधानमंत्री हो जाएँ,
तो देश एक दिन भी नहीं चलेगा।
लेकिन धर्म में
हज़ार गुरु हों—
तो उसे “आध्यात्मिक विविधता” कहा जाता है।
यहीं धोखा है।
राजनीति मानती है कि
मनुष्य स्वार्थी है,
इसलिए उस पर नियम चाहिए।
धर्म मानता है कि
गुरु पवित्र है,
इसलिए उस पर कोई नियम नहीं।
राजनीति बिगड़ती है
तो कानून बदलता है।
धर्म बिगड़ता है
तो नया गुरु आ जाता है।
समस्या ज्यों की त्यों रहती है।
धर्मगुरु का कोई चुनाव नहीं,
कोई कार्यकाल नहीं,
कोई जवाबदेही नहीं।
वह बोले—
तो सत्य।
गलत बोले—
तो भी लीला।
राजनीति में गलती अपराध है।
धर्म में गलती “रहस्य” बन जाती है।
इसलिए आज स्थिति यह है—
राजनीति पर लोग सवाल करते हैं,
धर्म पर डरते हैं।
जबकि होना उल्टा चाहिए था।
क्योंकि
राजनीति शरीर चलाती है,
धर्म मन।
शरीर बिगड़े तो दर्द दिखता है,
मन बिगड़े तो पीढ़ियाँ बिगड़ जाती हैं।
इस अध्याय का निष्कर्ष सरल है—
धर्म को गुरुओं की भीड़ नहीं चाहिए,
धर्म को विवेक की व्यवस्था चाहिए।
एक प्रधानमंत्री जरूरी है,
लेकिन उससे ज़्यादा ज़रूरी है—
संविधान।
ठीक वैसे ही
एक गुरु नहीं,
हज़ार गुरु नहीं—
बल्कि समझ का नियम चाहिए।
जहाँ व्यक्ति खुद पूछ सके—
“जो कहा जा रहा है,
वह सच है या सुविधा?”
धर्म का भविष्य
किसी नए गुरु में नहीं,
बल्कि गुरु-निर्भरता के अंत में है।


वेदान्त २.०

3
102 views