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पूजा, काम और प्रेम: दूरी की तीन अभिव्यक्तियाँ

पूजा, काम और प्रेम: दूरी की तीन अभिव्यक्तियाँ

पूजा और काम—दोनों एक ही तथ्य के दो रूप हैं।

प्रेम इन दोनों से अलग है, क्योंकि प्रेम समानता से जन्म लेता है, दूरी से नहीं।पूजा इसलिए होती है क्योंकि उसमें ऊँच-नीच का भाव होता है।

मानो कोई ऊँचे पहाड़ पर खड़ा हो और दूसरा नीचे टीले पर—
यही ऊपर-नीचे की स्थिति पूजा को जन्म देती है।काम भी इसी तरह पैदा होता है—
बड़े-छोटे, ऊँचे-नीचे, विपरीत गुण और विपरीत स्थिति से।

जहाँ विपरीतता है, वहाँ काम उत्पन्न होता है;
जहाँ विपरीतता है, वहीं पूजा भी जन्म लेती है
।स्त्री-पुरुष के बीच
जब स्वभाव, संस्कार, संस्कृति में दूरी और टकराव होता है,
तो उस विपरीतता से काम की तीव्रता बढ़ती है।

उसी तरह, जब दो स्थितियाँ इतनी अलग हों कि
“हम एक नहीं हो सकते”—
तब पूजा पैदा होती है।प्रेम इसका उलटा है।

जहाँ यह बोध हो कि
“यह तो मैं ही हो सकता हूँ, यह मेरा ही विस्तार है”
वहीं प्रेम जन्म लेता है।

प्रेम समानता है;
प्रेम में ऊँच-नीच नहीं, दूरी नहीं।काम, पूजा और सम्मान—तीनों दूरी से पैदा होते हैं।

जो जितना “दूर” लगेगा,
वह उतना ही या तो काम का कारण बनेगा,
या पूजा और अत्यधिक सम्मान का।उदाहरण से समझो—
यदि कोई स्त्री हमारे जाति, परिवार, संस्कार, समाज से
बहुत दूर है,
तो काम-उत्तेजना अक्सर अधिक होती है,
क्योंकि वहाँ दूरी है, अपरिचय है,
विपरीतता और असमानता है।

यही असमानता
काम को भी जन्म देती है और पूजा को भी।इसी तरह,
मैं राम की पूजा इसलिए करता हूँ
क्योंकि राम मुझे अद्भुत लगते हैं,
मेरे स्वभाव से बहुत दूर, बहुत ऊँचे लगते हैं।

पर यदि मेरे भीतर
राम के आदर्श, राम की नीति, राम के गुण आ जाएँ,
तो राम मेरे समान हो जाते हैं।जहाँ समानता आ जाए,
वहाँ दूरी नहीं रहती, विपरीतता नहीं रहती।

तब राम बाहर “पूजनीय” नहीं रहते,
वे भीतर समा जाते हैं।वहीं पूजा समाप्त हो जाती है
और केवल प्रेम बचता है।यही वेदान्त 2.0 की दिशा है:
जो अभी “ऊपर” दिखता है,
उसे भीतर लाना;
जो अभी पूज्य है,
उसे प्रेम में बदल देना।

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