
शिक्षक सम्मान या व्यवसाय....?
शिक्षकों की भावनाओं से खिलवाड़ कब तक..?
शिक्षक सम्मान या व्यवसाय....?
शिक्षकों की भावनाओं से खिलवाड़ कब तक..?
आज का एक कड़वा लेकिन ज़रूरी सवाल—
क्या शिक्षक सम्मान/पुरस्कार अब सेवा का प्रतीक न रहकर व्यवसाय बनता जा रहा है..?
कुछ स्वयंभू शिक्षक समूह और संस्थाएँ शिक्षक सम्मान/पुरस्कार के नाम पर शिक्षकों से शुल्क वसूल कर रही हैं।
कभी ₹399, ₹599, ₹799 तो कभी ₹3000 से ₹5000 तक की माँग की जाती है।
सिर्फ किसी व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़कर, फोटो या वीडियो मंगवाकर तथाकथित “सम्मान” दे दिया जाता है।
👉 क्या यही शिक्षक सम्मान की परिभाषा है..?
👉 क्या पैसे देकर खरीदा गया सम्मान, सच में सम्मान कहलाएगा..?
यह साफ़ तौर पर शिक्षकों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है।
जो शिक्षक समाज को दिशा देते हैं, वही शिक्षक आज ठगी और दिखावे का शिकार बनाए जा रहे हैं।
शिक्षक का असली सम्मान क्या है..?
➡️ शिक्षक का असली सम्मान उनके--
● समर्पण
● ईमानदार शिक्षण
● विद्यार्थियों के भविष्य निर्माण
● समाज में सकारात्मक योगदान
के आधार पर होना चाहिए,
न कि किसी समूह की सदस्यता या भुगतान के बदले।
सम्मान माँगा नहीं जाता, दिया जाता है—
वह भी निःशुल्क, निष्पक्ष और निष्कलंक रूप से।
टीचर्स ऑफ बिहार का स्पष्ट और कड़ा रुख--
टीचर्स ऑफ बिहार के प्रदेश प्रवक्ता रंजेश कुमार ने कहा—
“शिक्षक सम्मान के नाम पर शुल्क लेना न केवल अनैतिक है, बल्कि यह शिक्षकों की गरिमा पर सीधा प्रहार है। ऐसे आयोजनों का शिक्षक समाज को एकजुट होकर विरोध करना चाहिए।”
टीचर्स ऑफ बिहार के प्रदेश मीडिया संयोजक मृत्युंजय कुमार ने कहा—
“सम्मान वह होता है जो शिक्षक के कार्यों से स्वतः मिलता है, न कि पैसे देकर खरीदा जाए। शिक्षक समाज को चाहिए कि ऐसे फर्जी और व्यवसायिक सम्मानों से दूरी बनाए और खुलकर बहिष्कार करे।”
अब समय है जागरूक होने का....
✊ शिक्षकों को चाहिए—
■ ऐसे शुल्क आधारित सम्मान/पुरस्कार का बहिष्कार करें
■ खुलकर विरोध दर्ज कराएँ
■ अन्य शिक्षकों को भी सचेत करें
सम्मान नहीं, स्वाभिमान बचाइए।
शिक्षक हैं, ग्राहक नहीं।