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मणिकर्णिका घाट शाश्वत सत्य स्थानीय लोगों की नजर में

काशी के घाटों का पत्थर होने के नाते माँ गंगा और उनके घाटों को जितनी गहराई से मैं समझता हूँ, उतनी समझ किसी बाहर वाले को नहीं हो सकती। काशी महादेव की नगरी है और मणिकर्णिका घाट मोक्ष प्रदान करने वाला पावन स्थल। प्रतिदिन दर्जनों परिवार यहाँ अपने प्रियजनों की अंतिम यात्रा के लिए आते हैं, थके हुए, दुःख से टूटे हुए, भावनाओं से भरे हुए। लेकिन वर्षों से उनकी पीड़ा के साथ एक और पीड़ा जुड़ी रही है। बैठने की समुचित व्यवस्था का अभाव, स्वच्छ शौचालयों की कमी, और अंतिम संस्कार के लिए लंबा इंतज़ार। दाह संस्कार के बाद राख और अवशेषों की सफ़ाई की भी कोई स्थायी, सुव्यवस्थित व्यवस्था नहीं थी। यह स्थिति कोई नई नहीं, दशकों से चली आ रही थी, लेकिन किसी सरकार ने इसे गंभीरता से सुधारने का प्रयास नहीं किया।

आज जब माननीय प्रधानमंत्री श्री Narendra Modi जी के मार्गदर्शन और माननीय मुख्यमंत्री श्री MYogiAdityanath जी के नेतृत्व में मणिकर्णिका घाट पर सुविधाओं के विस्तार और व्यवस्थागत सुधार का कार्य आरंभ हुआ है, तो कुछ लोगों को अचानक काशी की चिंता सताने लगी है। यह संवेदनाएँ तब क्यों नहीं जागीं, जब शौचालयों के अभाव में लोगों को घाट के किनारे ही विवश होना पड़ता था? जब गंदगी और दुर्गंध के कारण खड़ा होना भी मुश्किल हो जाता था? लेकिन जैसे ही विकास की प्रक्रिया शुरू हुई, वैसे ही अफ़वाहों और भ्रम का दौर भी शुरू कर दिया गया।

यही स्थिति तब भी देखने को मिली थी, जब काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, नमो घाट और अस्सी घाट का कायाकल्प हो रहा था। आज उन परियोजनाओं के बाद घाटों की जो स्थिति है, उसे हर स्थानीय निवासी गर्व के साथ देखता है।

मणिकर्णिका घाट के पुनर्विकास का उद्देश्य किसी भी प्राचीन मंदिर, प्रतिमा या ऐतिहासिक धरोहर को हटाना नहीं, बल्कि उनका संरक्षण करते हुए घाट की व्यवस्थाओं को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना है। दाह संस्कार के लिए सुव्यवस्थित प्लेटफॉर्म, लकड़ी भंडारण स्थल, पूजा सामग्री के लिए स्थान, मुंडन स्थल, आगंतुकों के बैठने की सुविधा, स्वच्छ शौचालय और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएँ इसी सोच के तहत विकसित की जा रही हैं। घाट पर स्थित मढ़ी का भी पुनर्निर्माण हो रहा है।

सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही अफ़वाहों के विपरीत सच्चाई यह है कि किसी भी प्राचीन मंदिर या पुण्यश्लोक रानी अहिल्याबाई होलकर जी की प्रतिमा को कोई क्षति नहीं पहुँची है। निर्माण कार्य के दौरान तकनीकी कारणों से कुछ शिल्प और आकृतियों को अस्थायी रूप से हटाया गया है, जिन्हें पूरी सुरक्षा के साथ संरक्षित रखा गया है और पुनर्निर्माण पूर्ण होते ही उन्हें उनके मूल स्थान पर सम्मानपूर्वक पुनः स्थापित किया जाएगा। सभी पौराणिक धरोहरों का संरक्षण अत्यंत सावधानी और श्रद्धा के साथ किया जा रहा है।

मणिकर्णिका घाट का यह कायाकल्प किसी एक परियोजना भर का हिस्सा नहीं है, बल्कि काशी की आस्था, परंपरा और मानवीय गरिमा को सुदृढ़ करने का प्रयास है। उद्देश्य केवल संरचनाओं को नया रूप देना नहीं, बल्कि उन असंख्य परिवारों को सम्मानजनक सुविधाएँ देना है जो अपने प्रियजनों की अंतिम विदाई के लिए यहाँ आते हैं। यह कार्य काशी की उस शाश्वत दिव्यता को और अधिक सशक्त करेगा, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस पावन नगरी की गरिमा और व्यवस्थाओं पर गर्व कर सकें।

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