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सियासी बेशर्मी का चरम: बलात्कार पर कांग्रेस नेताओं के 'कुतर्क', बरैया से लेकर कर्नाटक तक गिरा नैतिकता का स्तर

✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा

विशेष रिपोर्ट | भोपाल

भारतीय राजनीति में भाषा की मर्यादा और महिलाओं के प्रति सम्मान का ग्राफ किस कदर गिर चुका है, इसका प्रमाण कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया के ताजा बयानों में मिलता है। लेकिन यह केवल एक विधायक की निजी राय नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर पनप रही उस मानसिकता का हिस्सा है जो अपराधियों को सजा दिलाने के बजाय उनके अपराध के लिए 'तर्क' और 'मजे' की तलाश करती है।

कर्नाटक से लेकर मध्य प्रदेश तक: एक जैसी 'विकृत' सोच : अभी कुछ समय पहले कर्नाटक विधानसभा में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के.आर. रमेश कुमार ने जो कहा था, उसे देश कभी नहीं भूल सकता। सदन की कार्यवाही के दौरान उन्होंने हँसते हुए कहा था कि— "जब बलात्कार होना तय हो, तो लेट जाओ और उसका आनंद लो।" सबसे दुर्भाग्यपूर्ण तो यह था कि लोकतंत्र के मंदिर (विधानसभा) में इस बयान पर विरोध होने के बजाय स्पीकर और अन्य सदस्य ठहाके लगाते नजर आए थे। आज मध्य प्रदेश में फूल सिंह बरैया भी उसी राह पर चलते दिख रहे हैं। खूबसूरत लड़की देखने पर 'दिमाग विचलित' होने और बलात्कार होने की बात कहकर बरैया न केवल अपराधियों को क्लीन चिट दे रहे हैं, बल्कि पीड़ित बेटियों के जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं।

'मतिभ्रष्ट' नेतृत्व और विनाशकाल: रामचरितमानस की चौपाई "जाको प्रभु दारुण दुख दीन्हा, ताकी मति पहले हर लीन्हा" आज कांग्रेस की स्थिति पर सटीक बैठती है। जब किसी विनाशकारी समय की शुरुआत होती है, तो विवेक सबसे पहले साथ छोड़ देता है। कर्नाटक से शुरू हुआ यह बेशर्मी का सिलसिला अब मध्य प्रदेश के गलियारों तक पहुँच गया है, जो इस पार्टी के वैचारिक पतन का संकेत है।

धार्मिक ग्रंथों की आड़ में घिनौनी राजनीति: विधायक बरैया ने जिस तरह से 'रुद्रयामल तंत्र' और अन्य ग्रंथों का हवाला देकर अनुसूचित जाति-जनजाति की महिलाओं के प्रति हिंसक मानसिकता को जायज ठहराने की कोशिश की है, वह न केवल ऐतिहासिक रूप से गलत है बल्कि सामाजिक विद्वेष फैलाने वाला है। डॉ. महेश प्रसाद मिश्र जैसे समाज के प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि ऐसे लोग "ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी" जैसी चौपाइयों का गलत संदर्भ लेकर समाज को गुमराह करते हैं, जबकि असल में ऐसी नीच सोच रखने वाले ही ताड़ना (दंड) के पात्र हैं।

जनता के ज्वलंत प्रश्न:
1. चरित्रहीनता का ठप्पा: क्या कांग्रेस अब ऐसे ही 'चरित्रहीन' और 'अमर्यादित' नेताओं की शरणस्थली बन गई है?
2. दोहरा मापदंड: हाथरस से लेकर अन्य जगहों पर 'बेटी बचाओ' का नारा देने वाली प्रियंका गांधी अपने इन नेताओं के बयानों पर मौन क्यों हैं?
3. जनता का फैसला: क्या ऐसी 'वेंटिलेटर' पर चल रही पार्टी को, जो महिलाओं की अस्मत का मजाक उड़ाती है, राजनीति में रहने का हक है?
बलात्कार अपराध है, और अपराध पर तर्क गढ़ना हिंसा का सबसे क्रूर रूप है। कर्नाटक की घटना हो या बरैया का बयान, यह साफ है कि कांग्रेस अब नैतिक रूप से खोखली हो चुकी है। अब फैसला जनता के हाथ में है कि वह ऐसे नेताओं को सत्ता की कुर्सी पर देखना चाहती है या इतिहास के कूड़ेदान में।

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