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“71 पद, 0 UR, 0 EWS! क्या सामान्य वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर अब सिस्टम से बाहर कर दिए गए हैं?”

✍️ डॉ. महेश प्रसाद मिश्रा I भोपाल
मध्यप्रदेश कृषि विभाग में सहायक संचालक पदों पर जारी ताज़ा भर्ती अधिसूचना ने एक नहीं, दो बड़े वर्गों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कुल 71 पद—और न अनारक्षित (UR) के लिए कोई सीट,न ही आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए। यह सिर्फ एक प्रशासनिक आँकड़ा नहीं,बल्कि समान अवसर और संतुलन की अवधारणा पर सीधा प्रहार है।
सवाल उठता है—👉 जब EWS को आर्थिक आधार पर न्याय देने का वादा किया गया था, तो यहाँ EWS पूरी तरह गायब क्यों है?
👉 क्या सामान्य वर्ग और EWS अब केवल चुनावी भाषणों तक सीमित रह गए हैं?
👉 क्या योग्यता और आर्थिक कमजोरी—दोनों की कोई कीमत नहीं बची?
यह मामला किसी एक भर्ती तक सीमित नहीं दिखता।यह उस नीतिगत प्रवृत्ति का संकेत है जहाँ प्रतिनिधित्व का संतुलन टूटता दिखाई दे रहा है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि प्रदेश में सामान्य वर्ग और EWS से आने वाले जनप्रतिनिधि,
जो इन्हीं वर्गों के मतों से चुनकर आते हैं— पूरी तरह मौन हैं।
ना विधानसभा में सवाल,ना सार्वजनिक बयान, ना सरकार से जवाबदेही की माँग।
दूसरी ओर, अन्य वर्गों के प्रतिनिधि अपने समाज से जुड़े मुद्दों पर खुलकर, संगठित होकर और लगातार आवाज़ उठाते नज़र आते हैं। तो सवाल स्वाभाविक है—
👉 क्या सामान्य वर्ग और EWS की चुप्पी को उनकी सहमति मान लिया गया है?
👉 क्या “डबल इंजन सरकार” में भी समान प्रतिनिधित्व अब प्राथमिकता नहीं रहा?

सरकार “विश्वगुरु भारत” की बात करती है,लेकिन विश्वगुरु बनने के लिए योग्यता, पारदर्शिता और सभी वर्गों का भरोसा ज़रूरी होता है— ना कि कुछ वर्गों को पूरी तरह शून्य पर छोड़ देना।
यह खबर किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि एकांगी नीति, असंतुलन और राजनीतिक चुप्पी के खिलाफ चेतावनी है।
अब समय आ गया है कि सामान्य वर्ग और EWS— राजनीतिक रूप से सजग हों, सवाल पूछें, और जवाब माँगें।
क्योंकि अगर आज आवाज़ नहीं उठी, तो आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी—
👉 जब अवसर खत्म हो रहे थे, तब आप चुप क्यों थे?
यह संघर्ष किसी के विरोध का नहीं, समान अवसर, संतुलन और संवैधानिक भावना की रक्षा का है।

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