हर विचार, हर स्मृति, हर पहचान—‘मैं’ को मजबूत करती है।
जैसे-जैसे ‘मैं’ मजबूत होता है, बंधन गहरा होता है।
मुक्ति का अर्थ है—इस बंधन को पहचानना,
इस
धर्म, ‘मैं’ और अस्तित्व — विस्तार और गहराई
धर्म और उसके नियमों की यात्रा
धर्म, मानव सभ्यता की सबसे पुरानी खोजों में से एक है।
हर सभ्यता, हर युग ने अपने-अपने तरीके से परम सत्य को जानने की चेष्टा की है।
कहीं वेदों की ऋचाएँ गूँजीं, कहीं बौद्ध भिक्षुओं की शांति, कहीं सूफियों की मस्ती, कहीं संतों की निर्गुण भक्ति।
हर जगह प्रश्न वही—मैं कौन हूँ?
ईश्वर क्या है?
मुक्ति क्या है?
धर्म ने उत्तर देने की कोशिश की।
उत्तर देने के लिए उसने नियम बनाए, विधियाँ गढ़ीं, साधनाएँ दीं।
क्योंकि मनुष्य का मन बिना व्यवस्था के भटक जाता है, नियम उसे दिशा देते हैं।
जैसे नदी को बाँधने के लिए तट होते हैं, वैसे ही साधना के लिए नियम।
लेकिन क्या तट ही नदी हैं?
नदी तो तटों के बीच बहती है, पर उसका जीवन तटों में नहीं, बहाव में है।
ठीक वैसे ही, धर्म के नियम साधना का मार्ग दिखाते हैं, मगर वे स्वयं मंज़िल नहीं।
दीवारें और उनकी छाया
जैसे ही मनुष्य नियमों को पकड़ लेता है, वे दीवार बन जाते हैं।
धर्म ने दीवारें गिराने के लिए उपाय दिए, लेकिन मनुष्य ने उन्हीं उपायों को पकड़कर नई दीवारें खड़ी कर लीं।
अब साधना साध्य बन गई, उपाय ही उद्देश्य बन गया।
मुक्ति का मार्ग साधनों के जाल में उलझ गया।
सोचिए, अगर विधियों, मंत्रों, व्रतों, तीर्थों से मुक्ति मिलनी होती,
तो आज तक न जाने कितने लोग पार हो चुके होते।
सदियों से लाखों लोग तप, साधना, त्याग, संयम में लगे हैं—
फिर भी क्या मानव भीतर से मुक्त हुआ?
खोना—पाना नहीं
साधना का अर्थ है खोना, छोड़ना, मिटाना।
पर मनुष्य ने साधना को पाने का साधन बना लिया।
“मैं साधक बन गया, मैं त्यागी हूँ, मैं ज्ञानी हूँ”—यह नया ‘मैं’ है।
पहले ‘मैं’ संसार में था, अब ‘मैं’ साधना में है।
केन्द्र वही है, केवल वस्त्र बदल गए।
धर्म का जन्म ‘मैं’ को तोड़ने के लिए हुआ था,
पर धर्म ही ‘मैं’ का सबसे बड़ा किला बन गया।
धर्म के नाम पर त्याग, संयम, तप—
पर भीतर सूक्ष्म अहंकार और गाढ़ा हो गया।
अब गर्व यह है कि “मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं निकट हूँ, मैं मुक्त हूँ।”
यह दमन है, मुक्ति नहीं।
‘मैं’ का रहस्य
‘मैं’ क्या है?
क्या यह कोई वस्तु है?
क्या इसे छुआ जा सकता है, देखा जा सकता है?
‘मैं’ केवल एक विचार है—
हर भूमिका, हर पहचान, हर स्मृति के साथ यह जन्म लेता है।
आज “मैं लेखक हूँ”, कल “मैं भक्त हूँ”, परसों “मैं ज्ञानी हूँ”—
रूप बदलते हैं, केन्द्र वही रहता है।
अस्तित्व के 99% नियमों में सब कुछ परिवर्तनशील है—
जन्म, विकास, मृत्यु—यह प्रकृति की लय है।
लेकिन ‘मैं’ इस लय से बाहर है।
‘मैं’ को पकड़ना, छोड़ना—दोनों ही भ्रम हैं।
क्योंकि ‘मैं’ को पकड़ते ही वह और मजबूत हो जाता है,
छोड़ने की कोशिश करो, तो भी वह छाया की तरह पीछा करता है।
असत्य की भूमिका
यह 1% ‘मैं’—असत्य है, भ्रम है—
लेकिन इसी भ्रम के कारण जीवन में गति है, खोज है, प्रश्न है।
यदि यह भ्रम न हो, तो जीवन में कोई हलचल नहीं,
कोई विकास नहीं, कोई कला, कोई विज्ञान, कोई धर्म नहीं।
यह असत्य, सत्य को गतिशील बनाता है।
मनुष्य का विशिष्ट जन्म
अन्य प्राणी केवल जैविक जन्म लेते हैं—
भोजन, विश्राम, प्रजनन, जीवन और मृत्यु।
मनुष्य में एक और जन्म होता है—
मन का जन्म, ‘मैं’ का जन्म।
यह ‘मैं’ ही है जो इतिहास रचता है,
सभ्यता बनाता है,
ईश्वर की खोज करता है।
हर विचार, हर स्मृति, हर पहचान—‘मैं’ को मजबूत करती है।
जैसे-जैसे ‘मैं’ मजबूत होता है, बंधन गहरा होता है।
मुक्ति का अर्थ है—इस बंधन को पहचानना,
इस भ्रम को पूरी तरह देख लेना।
धर्म, ध्यान और ‘मैं’ का विस्तार
अधिकांश साधना, ध्यान, धर्म—
‘मैं’ को ही नया रूप देते हैं।
“मैं साधक हूँ”, “मैं ज्ञानी हूँ”, “मैं त्यागी हूँ”—
यह सब ‘मैं’ की नई-नई भूमिकाएँ हैं।
जब तक यह स्पष्ट नहीं होता कि
“मैं कुछ नहीं हूँ, मैं केवल एक मानसिक संरचना हूँ”—
तब तक भ्रम बना रहता है।
मुक्ति की पहली सीढ़ी
मुक्ति का अर्थ है—
‘मैं’ के इस भ्रम को पूरी तरह देखना,
उसकी हर परत को पहचानना।
यह समझना नहीं,
बल्कि भीतर से देखना है—
जैसे कोई आईना अपने ही चेहरे को देख ले।
जब यह देखना घटता है,
तब न कोई धर्म रहता है,
न कोई उपाय,
न कोई शास्त्र,
न कोई भगवान से सौदा।
तब व्यक्ति मौन, कोरा, सीधा—
वृक्ष की तरह खड़ा हो जाता है।
यही सत्य है।
‘मैं’ और वर्तमान
यदि वास्तविक मुक्ति चाहिए,
यदि अस्तित्व को जानना है—
तो केवल दो विषयों को भीतर से देखना है—
‘मैं’ और वर्तमान।
‘मैं’ को देखना,
उसकी हर परत, हर पहचान, हर भूमिका को पहचानना—
यही ब्रह्मांड की सबसे बड़ी खोज है।
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आगे की यात्रा
अब प्रश्न यह नहीं कि धर्म क्या है,
बल्कि यह है कि ‘मैं’ क्या है?
क्या यह सचमुच है, या केवल एक छाया है?
जब तक यह छाया बनी रहेगी,
तब तक सत्य केवल एक संभावना है।
जैसे ही छाया देख ली जाती है,
सत्य अपने आप प्रकट हो जाता है।
𝕋𝕙𝕖 𝕌𝕝𝕥𝕚𝕞𝕒𝕥𝕖 𝕊𝕡𝕚𝕣𝕚𝕥𝕦𝕒𝕝 & ℙ𝕙𝕚𝕝𝕠𝕤𝕠𝕡𝕙𝕚𝕔𝕒𝕝 𝔽𝕣𝕒𝕞𝕖𝕨𝕠𝕣𝕜 𝕠𝕗 𝕥𝕙𝕖 𝟚𝟙𝕤𝕥 ℂ𝕖𝕟𝕥𝕦𝕣𝕪
🙏🌸 — 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓣 𝓐𝓰𝓎𝓪𝓷𝓲
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