
कानून, संविधान और राष्ट्र की गरिमा :
THE. INDIVIDUAL PUBLICATION
जेएनयू परिसर में उठाया गया “क़ब्र खुदेगी” जैसा नारा केवल एक असंयमित अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह सीधे-सीधे देश के संवैधानिक ढाँचे, लोकतांत्रिक मर्यादा और प्रशासनिक व्यवस्था को चुनौती देने जैसा है। यह प्रश्न अत्यंत गंभीर है कि किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के विरुद्ध इस प्रकार का उग्र और हिंसक संकेत देने वाला नारा लगाने का साहस आखिर किसने और किस मानसिकता से दिया।
यहाँ बात किसी राजनीतिक दल की नहीं है। यह बात है राष्ट्र के प्रशासन, संविधान की सर्वोच्चता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा की। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं हो सकता कि कोई भी व्यक्ति या समूह कानून, व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपमानित करने वाले या हिंसा को प्रेरित करने वाले नारे लगाए।
प्रशासन का दायित्व केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि कानून के विरुद्ध कोई भी गतिविधि तुरंत और निष्पक्ष कार्रवाई के दायरे में आए। धर्म, जाति या भावनात्मक उकसावे के नाम पर यदि कानून को कमजोर किया जाता है, तो उसका परिणाम पूरे सामाजिक ढाँचे को खोखला कर देता है।
आज भारतीय सामाजिक संरचना धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है, क्योंकि समय पर कठोर और न्यायसंगत कदम नहीं उठाए जाते। जब कानून के प्रति भय समाप्त हो जाता है, तब अनुशासन भी समाप्त हो जाता है। और जब अनुशासन समाप्त होता है, तब समाज अराजकता की ओर बढ़ता है।
यह सत्य है कि—
प्रशासन सुदृढ़ रहेगा, तो देश सुदृढ़ रहेगा।
कानून का सम्मान रहेगा, तो समाज सुरक्षित रहेगा।
अतः अब समय आ गया है कि यह स्पष्ट किया जाए—
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान की आत्मा है, लेकिन संविधान के विरुद्ध जाने की स्वतंत्रता किसी को नहीं दी जा सकती।
— कृष्ण चन्द्र दास
Press Member
Chief Editor, The Individual Press
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