
उधार का ज्ञान
जीवन चलाने में सहायक हो सकता है,
पर जीवन दे नहीं सकता।
VEDANTA 2.0 — एक स्पष्ट घोषणा
मैं किसी भी प्रकार का ज्ञान देने के पक्ष में नहीं हूँ।
मैं उस ज्ञान को समाप्त करने के पक्ष में हूँ
जिसे मनुष्य जीवन का सत्य समझ बैठा है।
यहाँ “ज्ञान” से मेरा अर्थ
गणित, विज्ञान, समाज, कला या बौद्धिक कौशल नहीं है।
वे जीवन के लिए आवश्यक उपकरण हैं।
जिस ज्ञान की मैं बात कर रहा हूँ
वह वह ज्ञान है जो
सत्य, आत्मा, ईश्वर, धर्म और अध्यात्म के नाम पर
मनुष्य ने उधार में ले रखा है।
ज्ञान दो प्रकार का होता है।
एक — स्मृति में जमा हुआ ज्ञान।
दूसरा — समझ, विवेक, निर्णय;
अच्छा–बुरा, सही–गलत की छँटनी।
यहीं से शब्द बनते हैं।
यहीं से मान्यताएँ बनती हैं।
यहीं से पहचान बनती है।
मैं इसी ज्ञान की बात कर रहा हूँ।
जो कुछ हमें “सत्य” के रूप में दिया गया है,
वह झूठ है —
इसलिए नहीं कि वह बेकार है,
बल्कि इसलिए कि वह उधार का है।
उधार का ज्ञान
जीवन चलाने में सहायक हो सकता है,
पर जीवन दे नहीं सकता।
अद्वैत, आत्मा, ईश्वर या सत्य को समझना
इस उधार के ज्ञान से असंभव है।
सत्य जटिल नहीं है।
आत्मा दूर नहीं है।
वास्तविकता अत्यंत सरल है।
पर सरलता कोई सिखाता नहीं —
क्योंकि सरलता को
ज्ञान बनाकर बेचा नहीं जा सकता।
जो कोई तुम्हें अध्यात्म का ज्ञान दे रहा है,
वह केवल
दूसरे का ज्ञान आगे बढ़ा रहा है।
धर्म संस्थाएँ
एक मन से दूसरे मन में
यह उधार का ज्ञान भरती रहती हैं।
यह किसी स्तर पर आवश्यक हो सकता है,
पर जीवन की नींव नहीं बन सकता।
जब तक मन
इस संचित ज्ञान से मुक्त नहीं होता,
आत्मा, ईश्वर और अस्तित्व का
रहस्य समझना संभव नहीं है।
मैं इस प्रक्रिया को
फ़ॉर्मेटिंग कहता हूँ।
RAM — मेमोरी वाली नहीं,
मूल RAM।
हमारा जीवन
दूसरों के डाले हुए वायरस पर चल रहा है।
कल की चिंता,
जागते हुए स्वप्न,
इच्छाओं की दुनिया,
डर, उपलब्धि, त्याग —
सब वायरस हैं।
जैसे नींद में स्वप्न चलते रहते हैं,
वैसे ही अधिकतर मनुष्य
जागते हुए स्वप्न में जी रहे हैं।
कोई धन और सत्ता का स्वप्न देख रहा है।
कोई ईश्वर और धर्म का।
कोई संन्यास और साधु बनने का।
कोई विज्ञान और खोज का।
पर स्वप्न तो स्वप्न ही है —
चाहे भौतिक हो या आध्यात्मिक।
जो पाने में डूबा है
और जो त्याग में डूबा है —
दोनों ही सोए हुए हैं।
सत्य, प्रेम और आत्मा
स्मृति-आधारित बुद्धि से
समझे नहीं जा सकते।
शरीर बदलता है।
बुद्धि बदलती है।
ज्ञान बदलता है।
असंख्य जन्मों में
हार्ड डिस्क बदलती रहती है,
पर मूल RAM वही रहती है।
उसी मूल RAM को
आत्मा कहा गया है।
मन — अर्जित है।
आत्मा — मूल है।
अधिकांश मनुष्य
रजस और तमस में जी रहे हैं —
चंचलता और अंधकार में।
बहुत कम लोग
सत्त्व को छूते हैं,
और लगभग कोई नहीं
सत्त्व से आगे सत्य तक पहुँचता है।
सत्य तक पहुँचना ही
ईश्वर तक पहुँचना है।
यही वास्तविक जीवन है।
पर जब तक “मैं”
दूसरों के ज्ञान से भरा है,
तब तक
अपनी ही वास्तविक RAM को
देखना असंभव है।
मैं नया ज्ञान देने में रुचि नहीं रखता।
और मैं हर मन को
खाली करने की सलाह भी नहीं देता।
जो जीवन की
प्रारंभिक अवस्था में हैं,
उन्हें मैं नहीं छेड़ता।
पर जो कहते हैं —
“हम गुरु हैं”,
“हम ज्ञानी हैं”,
“हम धार्मिक हैं”,
“हम पुण्यात्मा हैं” —
और जिनके जीवन में
रस, आनंद, प्रेम और जीवंतता नहीं है —
उनसे मैं कहता हूँ:
पूरा फ़ॉर्मेट हो जाओ।
Vedanta 2.0
शुरुआती लोगों के लिए नहीं है।
यह विश्वासियों के लिए नहीं है।
यह ज्ञान संग्रह करने वालों के लिए नहीं है।
यह उनके लिए है
जो यह महसूस करते हैं कि
इतना जानने के बाद भी
जीवन घटा नहीं है।
उनके लिए Vedanta 2.0
शिक्षा नहीं है —
विस्मृति (Unlearning) है।
𝕍𝕖𝕕𝕒𝕟𝕥𝕒 𝟚.𝟘 — 𝕋𝕣𝕦𝕥𝕙 𝕚𝕟 𝕥𝕙𝕖 𝔼𝕣𝕒 𝕠𝕗 𝕄𝕚𝕟𝕕 · वेदान्त २.० — मन के युग में सत्य — 🙏🌸 अज्ञात अज्ञानी
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