*प्रकाशनार्थ* *‘मैं इस गणतंत्र का एक बंदी हूं…’* *(आलेख : रूपेश कुमार सिंह)*26 जनवरी 2026 को हमारा गणतंत्र अपना 76 वर्ष पूरा करेगा। गणतंत्र या लोकतंत्र की प्रसिद्ध परिभाषा, जिसे हम बचपन से पढ़ते व सुनते आ रहे हैं, वो है -- जनता का, जनता के लिए व जनता के द्वारा संचालित शासन। क्या वर्तमान समय में उक्त परिभाषा हमारे देश के गणतंत्र पर सटीक बैठती है? क्या हम या हमारे शासक वर्ग भी ईमानदारी से यह कह सकते हैं कि हमारे देश में सच्चे अर्थों में लोकतंत्र है? कतई नहीं।आज हमारे देश में पूंजीपतियों का, पूंजीपतियों के लिए व पूंजीपतियों के द्वारा संचालित शासन है। आज हमारे देश में गणतंत्र की जगह पर पूंजीतंत्र, लूटतंत्र व गनतंत्र है।वर्तमान में हमारे देश की सत्ता पर काबिज ब्राह्मणीय हिंदुत्व फासीवादी नरेंद्र मोदी की सरकार ने लोकतंत्र के सभी अंगों को पंगु बना दिया है। पूरे देश में एकछत्र राज का सपना पूरा करने के लिए आरएसएस व भाजपा जी-जान से जुटी है। इन्होंने स्पष्ट तौर पर घोषित कर रखा है कि जो उनके साथ नहीं है, वे इस देश के दुश्मन है।कल तक जहां देश का अर्थ विभिन्नता में एकता था, आज देश का अर्थ सत्ताधारी सरकार बन चुका है। अब सत्ताधारी सरकार के खिलाफ बोलना मतलब देश के खिलाफ बोलना है।इन्होंने चुनाव जीतने के लिए साम-दाम-दंड-भेद की नीति अपना रखी है। उसके बाद भी अगर ये चुनाव नहीं जीत पाते हैं, तो फिर विपक्षी पार्टियों के विधायकों को तोड़ने के लिए पैसा, सेंट्रल एजेंसियों की कारवाईयां, डराने-धमकाने आदि रास्तों का सहारा लेते है और राज्यों में अंततः अपनी सरकार बना लेते हैं। कल तक विपक्ष के भ्रष्ट नेता (इनके ही द्वारा घोषित) इनकी पार्टी में शामिल होते ही ईमानदार बन जाते है और इन पर दर्ज दर्जनों मुकदमों को वापस ले लिया जाता है।अपने मित्र उद्योगपतियों को बहुमूल्य खनिज संपदा को सौंपने के लिए ये आदिवासियों का जनसंहार करते है। सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करने वालों को ‘देशद्रोही’, ‘अर्बन नक्सल’ घोषित करती है। अपने हक-हुकूक का आवाज बुलंद करने पर मुस्लिमों को आतंकवादी घोषित किया जाता है, तो सिखों को खालिस्तानी। इस सरकार ने शिक्षा का भगवाकरण कर छात्रों को झूठा इतिहास पढ़ने को बाध्य किया है, तो युवाओं को बेरोजगारी के अंतहीन दलदल में धकेल दिया है।महिलाओं को चारदीवारी के अंदर पूरी तरह से कैद करने की पूरी कोशिश भी हमारे ‘गणतंत्र’ के संचालक कर रहे है। हमारे गणतंत्र में ‘गणतंत्र’ के नाम पर क्या चल रहा है, यह अगर हम अपनी आंखों से संप्रदायवाद, जातिवाद, अंधभक्ति आदि का पर्दा हटाकर देखें, तो स्पष्ट दिख ही रहा है कि हमारा ‘गणतंत्र’ बिल्कुल ‘गनतंत्र’ में तब्दील हो चुका है।आप जानते है कि हमारे गणतंत्र में बड़ी संख्या में कैदखाने (जेलें) भी है, जिनमें लाखों बंदी कैद हैं। क्या आप कैदखाने में बंद इस गणतंत्र के बंदियों के बारे में जानते हैं?मैं इस गणतंत्र का एक बंदी हूं और पिछले 42 महीने से कैदखाने में कैद हूं। 42 महीने पहले मैं स्वतंत्र पत्रकारिता करता था और सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ सिर्फ लिखता ही नहीं था, बल्कि बोलता भी था। फलतः सरकार ने 17 जुलाई 2022 को मुझ पर काला कानून यूएपीए की कई धाराएं लगाकर मुझे गिरफ्तार कर लिया और 18 जुलाई 2022 को जेल भेज दिया।तब से मैं झारखंड के सरायकेला डिस्ट्रिक्ट जेल और बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल, होटवार (रांची) एंव बिहार के शहीद जुब्बा सहनी सेंट्रल जेल, भागलपुर में कैद रहा और फ़िलहाल आदर्श सेंट्रल जेल, बेऊर (पटना) में कैद हूं।*जेलों का हाल और कैदियों के अधिकार*बिहार-झारखंड के 90 प्रतिशत जेलों में क्षमता से अधिक (डेढ़ गुणा व कहीं-कहीं दुगुना) बंदी हैं। किसी भी जेल में जेल मैनुअल के अनुसार नाश्ता, भोजन, तेल-साबुन आदि नहीं मिलता है। हां! अगर आप दबंग है, तो फिर आप जेल अधिकारियों को पैसे देकर जेल में हीटर पर भी स्वादिष्ट खाना बनवा सकते है या घर व होटल से भी मंगवा सकते है।बाकी बंदियों को तो सड़ा हुआ चावल, पानी की तरह पतली दाल, सब्जी के नाम पर आलू का दो-चार टुकड़ा व कीड़ा लगा हुआ हरी सब्जी का दो-चार कच्चा टुकड़ा व पानी, जली व कच्ची रोटियां ही नसीब में होती है। दबंग व पैसे वाले बंदियों का बिस्तर 6 फिट लंबा व 3 फीट चौड़ा होता है. तो उतनी ही जगह में 3-4 आम बंदियों को रहना पड़ता है।भारत के सुप्रीम कोर्ट (महाराष्ट्र राज्य बनाम प्रभाकर पांडुरंग 1966) के अनुसार, ‘किसी भी बंदी या कैदी को संविधान द्वारा प्रदत्त अन्य मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अनुच्छेद 21, जीवन का अधिकार’ भी प्राप्त है।' सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ‘एक कैदी, चाहे वह विचाराधीन हो या दोषी और यहां तक कि अदालत में उसके विरुद्ध आरोपित या सिद्ध अपराध चाहे जो भी हो, देश के अन्य नागरिकों की तरह स्वतंत्रता के अलावा सभी अधिकारों का आनंद ले सकता है।' सुप्रीम कोर्ट के फैसले की रौशनी में अगर हम बिहार-झारखंड के जेलों में बंद बंदियों की स्थिति को देखते हैं, तो यह एक स्वप्न-सा लगता है, क्योंकि बिहार झारखंड की जेलों में बंदियों को न तो मानव सम्मान के साथ जीने का अधिकार, शीघ्र सुनवाई का अधिकार, स्वास्थ्य व चिकित्सा उपचार का अधिकार, हथकड़ी के खिलाफ सुरक्षा का अधिकार, जेल में दुर्व्यवहार व यातना के खिलाफ सुरक्षा का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, काम के लिए उचित मजदूरी का अधिकार एवं उचित आवास का अधिकार हासिल है और न ही जेल मैन्युअल के अनुसार नाश्ता, भोजन व अन्य सुविधाएं ही मिलती है।यहां तक कि बंदियों को अपने परिजनों व वकीलों को पत्र तक लिखने का अधिकार जेल प्रशासन नहीं देता है, फिर कविता, कहानी व लेख लिखने के बारे में तो ज्यादातर बंदी सोच भी नहीं पाते हैं। यह सब बहुत मुश्किल है। आप काॅल के दौरान, मुलाकाती में अपनी बातें, कविताएं, अनुभव, अपनी परेशानियां साझा कर सकते हैं, वह भी कई बार समयाभाव के कारण टुकड़ों-टुकड़ों में।बिहार-झारखंड के जेलों में रहते हुए मैंने यही जाना कि जेल एक यातनागृह है, जिसे सुधारगृह तो बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता है। जेल भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा केंद्र है, यहां भ्रष्टाचार खुलेआम होता है। अगर आपके पास पैसा है, तो आपके लिए जेल भी स्वर्ग है और अगर आपके पास पैसा नहीं है, तो जेल आपके लिए नर्क से भी बदतर है।जेल में इलाज के नाम पर सिर्फ धोखा होता है। अगर आप किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो जाएं, तो आपकी मौत जेल में ही निश्चित है, लेकिन आपकी मौत बाहर के अस्पताल में इलाज के दौरान ही दिखाई जाएगी।मैं जब गिरफ्तार होकर सरायकेला डिस्ट्रिक्ट जेल में गया, तो वहां मुझे सेल के ऐसे कमरे में रखा गया, जिसके बगल के कमरों में कुष्ठ, टीबी व एड्स से पीड़ित बंदी थे और हम सभी का स्नानघर व शौचालय काॅमन था।मेरे विरोध करने पर मुझे पुराने महिला वॉर्ड (भूत बंगला के नाम से प्रसिद्ध) में अकेले बंद कर दिया गया, जिसकी छत से बारिश में पानी टपकता था और पूरे कमरे में पानी ही पानी हो जाता था। नतीजा, मुझे एक कोने में बैठकर दिन-रात बितानी पड़ती थी। मेरे परिजनों द्वारा भेजे गए किताब, काॅपी व कलम को जेल प्रशासन ने मुझे देने से इंकार कर दिया। खाना बिल्कुल भी खाने लायक नहीं था। जब मैंने 15 अगस्त को भूख हड़ताल किया, तब जाकर मुझे काॅपी, किताब, कलम मिला, लेकिन मेरे जन्मदिन पर मेरे दोस्तों द्वारा मुझे भेजा गया पोस्टकार्ड भी नहीं दिया गया।बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा होटवार (रांची) में तो मेरी लिखित किताब ‘कैदखाने’ का आइना’ भी परिजनों को मुझे नहीं देने दिया गया, कहा गया कि इसमें जेल व्यवस्था के खिलाफ बातें लिखी गई है, जबकि वह किताब अमेजन व फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है। वहां के अधीक्षक हामिद अख्तर एक मुस्लिम थे, लेकिन उन्होंने जेल पुस्तकालय में मौजूद तस्लीमा नसरीन की सभी पुस्तकों पर प्रतिबंध लगा दिया था और उसे बंदियों को पढ़ने देने से मना कर दिया था।बाद में, शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीय कारा,भागलपुर में भी मैंने देखा कि तस्लीमा नसरीन की कुछ पुस्तकों को जेल पुस्तकालय की पुस्तक की सूची में ही प्रतिबंधित कर दिया था, ताकि कोई बंदी इसकी मांग ना करे। बिरसा मुंडा सेंट्रल जेल में मैंने जेल प्रशासन से इतिहास में एमए करने की इच्छा जाहिर की, तो मुझे बताया गया कि यहां मात्र एनआईओएस से 10वीं व 12वीं की पढ़ाई की सुविधा है।आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बिहार-झारखंड के किसी भी जेल में स्नातकोत्तर (एमए) की पढ़ाई की सुविधा इग्नू से भी नहीं है। इसलिए मुझे इग्नू के रामगढ़ (झारखंड) स्टडी सेंटर पर एमए में अपने निजी खर्च पर नामांकन लेना पड़ा।*तोड़ देती है सेल की ज़िंदगी*जेलों में सामान्य वॉर्ड के अलावा सेल (अंडा सेल, हाई सेक्युरिटी सेल आदि) भी होता है। मैं अपने 42 महीने के जेल में 33 महीने सेल में ही रहा हूं व वर्तमान में भी सेल में ही बंद हूं। सामान्य वॉर्ड के बंदियों को तो कुछ अधिकार भी हासिल है या कह सकते हैं कि कुछ सुविधाएं भी हासिल है, लेकिन सेल के बंदी अधिकांश सुविधाओं से महरूम है।यहां मैं उन सुविधाओं की बात कर रहा हूं, जो शरीर और मस्तिष्क के स्वस्थ रहने के लिए हर इंसान के लिए जरूरी है, एक बंदी के रूप में दास जीवन बिताने वाले बंदियों के लिए भी। सामान्य वॉर्ड के बंदी जेल में आयोजित शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग ले सकते हैं, लेकिन सेल के बंदी नहीं ले सकते है। सामान्य वॉर्ड में टीवी व जेल रेडियो (बिहार के जेलों में) का स्पीकर लगा हुआ है, जिससे बंदियों का कुछ मनोरंजन हो जाता है, मानसिक तनाव में राहत मिलती है लेकिन सेल में ऐसी कोई सुविधा नहीं है। सामान्य वॉर्ड के बंदी जेल पुस्तकालय में बैठकर पढ़ सकते हैं, लेकिन सेल के बंदी वहां नहीं बैठ सकते है। सामान्य वॉर्ड के बंदी जेल के मैदान में खेल-कूद सकते हैं, पूरे जेल में घूम फिर सकते है, लेकिन सेल के बंदी सेल से बाहर नहीं निकल सकते हैं। कह सकते हैं कि सेल, जेल के भीतर एक जेल है।सेल में आमतौर पर जेल प्रशासन ऐसे बंदियों को रखते हैं, जो सामान्य वॉर्ड में अवैध मोबाइल का इस्तेमाल करने, नशा करने व मारपीट करने के दोषी पाए जाते है। लेकिन अब सेल में ऐसे बंदियों को भी रखा जाने लगा है, जो अपने और बंदियों के अधिकारों के हनन पर उनके लिए आवाज उठाते है। उन्हें सेल में बंद कर उनसे सारा अधिकार छिन लिया जाता है।वैसे बंदी, जो बंदी अधिकारों के लिए आवाज उठाते रहते हैं, उन्हें प्रशासनिक लगाकर दूसरे जेलों में भी भेज दिया जाता है, जिन पर वहां पहुंचने के साथ ही जेल गेट से लेकर केंद्र स्थल (गुमटी) तक अनगिनत लाठी बरसती है।*जेलों में भ्रष्टाचार, पर सुनवाई नहीं*बिहार-झारखंड की जेलों में स्थानीय न्यायालय, उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। जब कोई बंदी वरीय अधिकारियों को जेल की भ्रष्ट व्यवस्था की शिकायत करते हैं, तो जेल प्रशासन अपने दलाल बंदियों के बयानों को कलमबद्ध कर रिपोर्ट बनाकर भेज देते हैं कि जेल में सब कुछ सही है। अगर कभी जांच के लिए अधिकारी आ जाए, तो जेल अधिकारी उन्हें अपने दलाल बंदियों से ही सिर्फ मिलाते हैं, बाकि बंदियों को अपने-अपने वॉर्ड में बंद कर देते है।अभी 18 जनवरी 2026 को पटना हाईकोर्ट के माननीय मुख्य न्यायाधीश संगम कुमार साहू, जेल आईजी प्रणव कुमार समेत कई अधिकारी आदर्श सेंट्रल जेल में आए और जेल का निरीक्षण किया, जिस दौरान सभी बंदियों को अपने-अपने वॉर्ड में बंद कर दिया गया और उन्हीं लोगों से मुखातिब करवाया गया, जो जेल प्रशासन की दलाली करते है। बाकी हमारे जैसे सामान्य बंदी तो कभी उनके सामने नहीं लाए जाते हैं।मैंने इस जेल में व्याप्त भ्रष्टाचार व बंदियों के शोषण और दमन पर एक आवेदन पटना डीएम को 15 दिसंबर 2025 को भेजा है, जिसकी प्रतिलिपि बिहार के उप-मुख्यमंत्री सह गृहमंत्री सम्राट चौधरी व राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को भी भेजा है, जिस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।जेल में भ्रष्टाचार चरम सीमा पर है, इसे चालू रखने के लिए आवाज उठाने वाले बंदियों के अधिकारों को छिना जाता है और चूंकि इन पर कभी अंकुश नहीं लगता, इसलिए आश्वस्त होकर ये भ्रष्टाचार में लिप्त है। वैसे भी, जेल में यह बात प्रचलित है कि जेल प्रशासन अपने भ्रष्टाचार की कमाई का एक बड़ा हिस्सा मंत्रियों व वरीय अधिकारियों को भी देता है, इसलिए वे कोई कार्यवाही नहीं करते। फिर भी अगर कोई जांच टीम आ भी जाए, तो एक मोटी रकम देकर जेल प्रशासन सब मैनेज कर लेती है।मैं कुछ महीने से उच्च (बैड) काॅलेस्ट्रॉल, उच्च ट्राईग्लिसराइड्स, एलर्जी, एल 5 डिस्क स्लिप व याद्दाश्त कम होने की समस्याओं से पीड़ित हूं। पटना के स्पेशल एनआईए कोर्ट द्वारा आदर्श सेंट्रल जेल, बेऊर (पटना) के अधीक्षक को मेरे इलाज के लिए 11 दिसंबर 2025 को लिखित आदेश दिया गया है, लेकिन जेल प्रशासन द्वारा अब तक कोई उपचार नहीं कराया गया है। इससे पहले 01 नवंबर 2025 को भी इलाज के लिए आदेश जेल प्रशासन को कोर्ट द्वारा दिया गया था।इससे पहले भी स्वास्थ्य समस्या को लेकर कोर्ट में अर्जियां लगाई गई थीं, तब मैं भागलपुर शहीद जुब्बा सहनी सेंट्रल जेल में था। वहां कोर्ट आदेश होने के बाद व स्वास्थ्य समस्या को लंबे समय झेलने के बाद अस्पताल में दिखाया गया था। पर बेऊर जेल प्रशासन उससे भी आगे निकल चुका है, लंबे वक्त व दो- दो बार कोर्ट आदेश के बाद भी इनके कानों में जूं तक नहीं रेंगा।यह कोई नया नहीं है। मेरे इतने सालों का अनुभव यही कहता है कि किसी मामले में कोर्ट में आदेश होने के बाद भी जेल प्रशासन अक्सर उसका पालन नहीं करती है और बार-बार आर्डर देकर कोर्ट भी थक जाता है। इस तरह बंदियों के बहुतेरे मामले पेंडिंग ही रह जाते है या फिर एक थका देने वाले समय के बाद अमल में आते है। पूरे देश के न्यायालय के लिए ऐसा कोई क्षेत्राधिकार नहीं है, जो कि जेल के मनमाने पर न्यायालय की प्रबलता स्थापित कर सके और जेलों के बंदियों के अधिकारों को बचा सके।आदर्श सेंट्रल जेल, बेऊर (पटना) के अधीक्षक की तानाशाही तो इस कदर है कि वे बंदियों के द्वारा न्यायालय के नाम भेजे गए आवेदन को भी न्यायालय को नहीं भेजते हैं। बंदियों को ‘बंदी आवेदन पत्र’ देने से साफ इंकार कर देते है।74 वर्षीय माओवादी नेता प्रमोद मिश्रा सेल में मेरे कमरे के बगल वाले कमरे में ही है, उन्होंने दिसंबर 2025 में ‘बंदी आवेदन पत्र’ पर स्पेशल एनआईए कोर्ट, पटना, स्पेशल एनआईए कोर्ट, रांची व प्रधानमंत्री के नाम से आवेदन जेल कार्यालय को सुपुर्द किया, लेकिन जेल प्रशासन ने इन तीनों में से एक भी आवेदन को आगे नहीं भेजा। फलतः उन्होंने 26 जनवरी 2026 से अनिश्चितकालीन भूख-हड़ताल की घोषणा कर दी है, लेकिन अब उन्हें बंदी आवेदन पत्र भी नहीं दिया जा रहा है।‘मधुकर भगवान संभाले बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य’ (1987) में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ‘‘हम यह समझने में असफल रहे हैं कि कैदी को जेल प्रशासन के खिलाफ अपनी शिकायतों को अपने पत्र के माध्यम से बाहरी दुनिया के सामने क्यों नहीं रखना चाहिए …. . दोषसिद्धि और जेल में बंद होने के कारण, कैदी राजनीतिक अधिकारों को नहीं खोता है।' क्या इस ‘गणतंत्र’ के बंदियों को सुप्रीम कोर्ट के कथनानुसार व संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार कभी हासिल होगा? ‘जेल अपवाद है व जमानत नियम,’ यह धरातल पर फलीभूत कभी होगा या जेलों के यातनागृह में बंदियों को पीसकर भ्रष्ट अधिकारियों के पौ-बारह होते रहेंगे?क्या सच्चे गणतंत्र को स्थापित करने के लिए भारतीय जनता सड़कों पर उतरेगी? इसका जवाब ही ‘गणतंत्र’ के बंदियों का भविष्य तय करेगा।*(साभार : द वायर। रूपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं और वर्तमान में आदर्श सेंट्रल जेल, बेऊर, पटना (बिहार) में विचाराधीन बंदी हैं।)* Devashish Govind TokekarVANDE Bharat live tv news NagpurEditor/Reporter/JournalistRNI:- MPBIL/25/A1465Indian Council of press,NagpurJournalist CellAll India Media AssociationNagpur District PresidentDelhi Crime PressRNI NO : DELHIN/2005/15378AD.Associate /ReporterContact no.9422428110/9146095536Head office:- plot no 18/19, flat no. 201,Harmony emporise, Payal -pallavi society new Manish Nagar somalwada nagpur - 440015