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राष्ट्रमंडल दिवस के अवसर पर आप सभी को शुभकामनाएँ। आइए, पूरे विश्व में एकता, शांति और "वसुधैव कुटुंबकम् के भाव का प्रसार करें ।

एआई के लिए भारत की दृष्टि 'मानव' शब्द में समाहित है, जिसका अर्थ है मानव।आशा है कि इससे एआई और संबंधित विषयों पर सार्थक विचार-विमर्श होगा।

पटना स्थित ऊर्जा ऑडिटोरियम में बिहार ए०आई० समिट 2026 के दो दिवसीय कार्यशाला का उद्घाटन कल मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा किया गया।

#Kingrethink #searchlight

आइए विचारों का आदान-प्रदान करें। आइए समझ का आदान-प्रदान करें।कायस्थ (Kayastha) का हिंदी में मुख्य अर्थ 'शरीर (काया) में स्थित' से है। हिंदू धर्म और भारतीय इतिहास के संदर्भ में इसके शाब्दिक अर्थ: संस्कृत में 'काय' का अर्थ काया (शरीर) और 'स्थ' का अर्थ स्थित होना है। अध्यात्म में इसका अर्थ शरीर में रहने वाली 'जीवात्मा' से भी होता है।

आज हम सभी को आत्मा के रूप में देखने का प्रयास करें, जिसमें हम स्वयं भी शामिल हैं। सभी मतभेदों और विविधताओं से परे, हम एक ब्रह्मांडीय पिता की संतान हैं। हम आध्यात्मिक भाई हैं। राष्ट्रीय भाई दिवस की शुभकामनाएं।

राष्ट्रमंडल दिवस के अवसर पर आप सभी को शुभकामनाएँ। आइए, पूरे विश्व में एकता, शांति और "वसुधैव कुटुंबकम्” के भाव का प्रसार करें ।
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यह गुरु का कर्तव्य है कि वह शिष्य में दोष ढूँढ़े जिससे वह प्रगति कर सके, ऐसा नहीं कि वह सदैव उसकी प्रशंसा करे । तो यदि कोई तुम्हारे अंदर दोष देखे तो उसे इस भावना में स्वीकार करें। मेरी तो एक ही इच्छा है कि तुम और मेरे अन्य सभी शिष्य कृष्णभावनाभावित बन जायें।

(श्रील प्रभुपाद, गिरिराज को पत्र, मई 24, 1972)
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गुरुदेव के विचारों को सुनने के लिए पेज को लाइक और फॉलो करें और पोस्ट को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ। कुलाई श्री विष्णुमूर्ति मंदिर एक प्राचीन विष्णु मंदिर है जिसमें लगभग 600 वर्ष पुरानी एक प्रतिमा है। भारत के कर्नाटक राज्य में मंगलौर से लगभग 15 किलोमीटर उत्तर में सूरतकल के पास कुलाई शहर में स्थित है।

इस मंदिर के मुख्य देवता श्री विष्णुमूर्ति हैं, जो भगवान विष्णु का ही एक रूप हैं।
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परमेश्वर कृष्ण ही मूल हैं जिनसे सब कुछ उत्पन्न हुआ है। उस परमेश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए केवल आत्मसमर्पण करना ही पर्याप्त है, और यह श्रवण, जप आदि द्वारा भक्ति सेवा करने का परिणाम है। वे भौतिक जगत के विस्तार के कारण हैं। यह स्वयं भगवान द्वारा स्पष्ट किया जा चुका है। अहं सर्वस्य प्रभावः: “मैं ही सब कुछ का मूल हूँ।” अतः भौतिक जीवन रूपी इस बलवान बरगद के बंधन से मुक्त होने के लिए, मनुष्य को कृष्ण के समक्ष आत्मसमर्पण करना चाहिए। जैसे ही मनुष्य कृष्ण के समक्ष आत्मसमर्पण करता है, वह स्वतः ही इस भौतिक विस्तार से विरक्त हो जाता है।

Read the purport 📖:-https://vedabase.io/en/library/bg/15/3-4/
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🕉️Hare Krishna 🐚🐚शिव आज भी गुरु है।💫

इस्कॉन® कुलाई, मैंगलोर, आरती, जाप और गुरु पूजा मे आप सभी सादर आमन्त्रित है ।👇

🕗Time : Daily at 4.30 A:M / 7:10 A:M (IST),

🔗 YouTube recording Link :👇

📅 Date : 24th May 2026
👉https://www.youtube.com/live/pGg63vEjYQA?si=g6ZJnn-4_GAtXcUv

🔗Zoom Link : Join the link below 👇🏻

https://t.ly/temple

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https://us02web.zoom.us/my/iskconnantoor?pwd=OE5mcnYzRFlUcE81aHNpT1EwMDNnQT09

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Meeting Id: 494 026 3157
Passcode : 108

🪔🪔

कृपया इस लिंक 👆 का उपयोग करके जुड़ें और श्रवणम के इस अद्भुत अवसर का लाभ उठाएं।
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भागवतम की आज की कक्षा CC adi 7.119.120

🗣️Speaker :HG Nama Nistha Das Prabhuji ।

🔗 YouTube recording Link :👇
👉https://www.youtube.com/live/U5TWgqT0pkA?si=IsMsq4kZ34LWVkDg

🕗Time : 8 AM Onward

ⓥ Link : https://vedabase.io/en/library/cc/adi/7/119/

🔗 Zoom Link : https://us02web.zoom.us/j/83155853450?pwd=pmWl5YVZyv5hRf17QggM5RgQn8POHD.1

Meeting ID: 83155853450
Passcode : 108
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✨Hare Krishna ✨

Bhagavad Gita Verse Of the Day:Chapter 8 Verse 27👇

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्र्चन |
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन || २७ ||

न – कभी नहीं; एते – इन दोनों; सृती – विभिन्न मार्गों को; पार्थ – हे पृथापुत्र; जानन् – जानते हुए भी; योगी – भगवद्भक्त; मुह्यति – मोहग्रस्त होता है; कश्चन – कोई; तस्मात् – अतः; सर्वेषु कालेषु – सदैव; योग-युक्तः – कृष्णभावनामृत में तत्पर; भव – होवो; अर्जुन – हे अर्जुन |

Translation👇

हे अर्जुन! यद्यपि भक्तगण इन दोनों मार्गों को जानते हैं, किन्तु वे मोहग्रस्त नहीं होते | अतः तुम भक्ति में सदैव स्थिर रहो |

Commentary👇

कृष्ण अर्जुन को उपदेश दे रहे हैं कि उसे इस जगत् से आत्मा के प्रयाण करने के विभिन्न मार्गों को सुनकर विचलित नहीं होना चाहिए | भगवद्भक्त को इसकी चिन्ता नहीं होनी चाहिए कि वह स्वेच्छा से मरेगा या दैववशात् | भक्त को कृष्णभावनामृत में दृढ़तापूर्वक स्थित रहकर हरे कृष्ण का जप करना चाहिए | उसे यह जान लेना चाहिए कि इन दोनों मार्गों में से किसी की भी चिन्ता करना कष्टदायक है | कृष्णभावनामृत में तल्लीन होने की सर्वोत्तम विधि यही है कि भगवान् की सेवा में सदैव रत रहा जाय | इससे भगवद्धाम का मार्ग स्वतः सुगम, सुनिश्चित तथा सीधा होगा | इस श्लोक का योगयुक्त शब्द विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है | जो योग में स्थिर है, वह अपनी सभी गतिविधियों में निरन्तर कृष्णभावनामृत में रत रहता है | श्री रूप गोस्वामी का उपदेश है – अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः – मनुष्य को सांसारिक कार्यों से अनासक्त रहकर कृष्णभावनामृत में सब कुछ करना चाहिए | इस विधि से, जिसे युक्तवैराग्य कहते हैं, मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है | अतएव भक्त कभी इन वर्णनों से विचलित नहीं होता, क्योंकि वह जानता रहता है कि भक्ति के कारण भगवद्धाम का उसका प्रयाण सुनिश्चित है |

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ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने प्रणतः क्लेश नाशाय गोविंदाय नमो नमः।। ए. सी.भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद और हमारी गुरुपरंपरा की जय हो।"संदर्भ: भगवद् गीता 4.1- 4.3" क्या आपको पता है अर्जुन से भी पहले भगवत गीता का ज्ञान करोडो वर्ष पहले सूर्य देव को दिया गया था?
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thanks & regards !

Jeetendra Sharan
(कायस्थ परिवार)

मसीभाजनसंयुक्तश्चरसि त्वं महीतले। लेखनी-कठिनीहस्ते चित्रगुप्त नमोऽस्तु ते। चित्रगुप्त! नमस्तुभ्यं लेखकाक्षरदायक कायस्थ जातिमासाद्य चित्रगुप्त! नमोऽस्तुते..
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https://indianpressunion.com/bihar-ai-submit-2026/
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