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क्या पाया उत्तराखंड ने

उत्तराखंड 25 साल बाद: क्या मिला, क्या खोया

42 शहीदों के बलिदान के बाद बना यह राज्य आज भी राजधानी के लिए जूझ रहा है। 9 नवम्बर 2000 को उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तरांचल) अस्तित्व में आया, परंतु राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी स्थायी राजधानी का प्रश्न पूरी तरह सुलझ नहीं पाया। ये देश का एकलौता राज्य है जिसकी कोई स्थायी राजधानी नहीं हैI गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया, किंतु स्थायी राजधानी को लेकर असमंजस और असंतोष आज भी बना हुआ है। उत्तराखंड आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ता हुआ प्रतीत होता है।
यह चिंता केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक भी है। विडंबना यह है कि उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, लोकभाषाएँ और परंपराएँ राज्य से बाहर बसे प्रवासी उत्तराखंडियों के बीच अधिक जीवंत दिखाई देती हैं, जबकि पहाड़ों के अनेक गाँव खाली हो चुके हैं। सांस्कृतिक असंतुलन की अनुभूति तब और गहरी होती है जब अस्थानीय त्योहारों और परंपराओं को राजकीय सम्मान मिलता है। (यह स्पष्ट है कि किसी भी अन्य त्योहार या परंपरा का विरोध नहीं है। प्रश्न केवल समानता का है।) क्या हमारे पारंपरिक पर्वों को भी राज्य से बाहर वही राजकीय मान्यता और अवकाश मिलता है, जो अन्य राज्यों की संस्कृति को उत्तराखंड में मिलता है? यह विचारणीय प्रश्न है। दूसरी ओर, प्रशासनिक तंत्र का पहाड़ों से दूरी बनाए रखना भी गंभीर चिंता का विषय है। जब नेता और अधिकारी पहाड़ी क्षेत्रों में तैनाती से बचना चाहते हैं, परंतु पहाड़ी राज्य होने के विशेषाधिकार और संसाधनों का लाभ लेना चाहते हैं, तो विकास की अवधारणा अधूरी रह जाती है। पहाड़ केवल पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि वहाँ के लोगों का जीवन, संघर्ष और पहचान हैं। पहाड़ो से पलायन भी संस्कर्ति व देश की सुरक्षा की दृस्टि से एक गंभीर रूप धारण कर रही हैI भारत के उत्तर पूर्व के राज्यों का ज्वलंत उदाहरण हमारे सामने हैI
आज आवश्यकता है आत्ममंथन की, भावनात्मक नारों से आगे बढ़कर ठोस संकल्प की। “जय उत्तराखंड” कहना आसान है, पर जरूरत “जियो उत्तराखंड” की है। यहाँ रहकर, यहाँ की संस्कृति को सहेजकर, यहाँ के संसाधनों का न्यायपूर्ण उपयोग कर, और पहाड़ के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाकर राज्य को सच में जीवंत बनाना, यह उद्देश्य था उत्तराखंड राज्य की मांग का I
“ स्थाई राजधानी गैरसैंण समिति”, जिसमें, सेवा से रिटायर वरिष्ठ नागरिक, युवा लड़के-लड़कियां महिलाएं राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले लोग हैं, एक गैर राजनीतिक संगठन है जो इस मुहिम को आगे बढ़ा रहा हैI सभी लोगों से अपेक्षा है कि आप तन मन धन से सहयोग करेंI गैरसैण राजधानी की मांग किसी दल, समूह या पार्टी की नहीं है बल्कि उन लोगों की है जिन्होंने इसके लिए आंदोलन किया बलिदान दिया और सरकार ने जनमत संग्रह करवाया I यह सब कौसिक कमेटी की रिपोर्ट मैं है I यही रिपोर्ट राज्य बनाने की प्रकिर्या का आधार भी थाI 25 साल बाद हमें क्या मिला वो आपके सामने है I
अतः हम सभी अपने-अपने स्तर पर विचार करें हम उत्तराखंड से क्या अपेक्षा रखते हैं और उत्तराखंड को हम क्या दे रहे हैं। यही सोच राज्य के भविष्य की दिशा तय करेगी। पहला कदम है स्थाई राजधानी।

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