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वैचारिक ध्रुवीकरण के बाजार में पिस्ता पटोरी का "कॉकरोच वर्ग" ।

"जो कंधों का गौरव था , वो खेमों का पहचान बन गया , संस्कृति का जो प्रतीक था , आज ध्रुवीकरण का सामान बन गया , धागों और गमछों से मत नापो किसी की सोच की गहराई को , यहां परिधान बदला तो समझो , इंसान का ईमान बदल गया"

भारत की मिट्टी में एक अजीब सी कशिश है। यहाँ की जनता जितनी भोली है, भावनात्मक रूप से उतनी ही संवेदनशील भी है। इतिहास गवाह है कि इस देश में लोगों के दिलों का रास्ता उनकी भावनाओं से होकर गुजरता है। लेकिन विडंबना देखिए, इसी भावुकता को अक्सर राजनीति और व्यवस्था के बाज़ार में एक मुनाफे के सौदे की तरह इस्तेमाल किया जाता है। चाहे वह धार्मिक अनुष्ठानों के नाम पर जुटने वाली आस्थावानों की अपार भीड़ हो, या राष्ट्र प्रमुख के ओजस्वी भाषणों से प्रभावित होकर अपनी बुनियादी समस्याओं (रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य) को भूल जाने वाला जनसमूह—जनता बार-बार इस वैचारिक चक्रव्यूह में फंस जाती है।

इस महादेश के भीतर वैचारिक पहचान का एक अलग ही भूगोल है। बिहार के समस्तीपुर जिले का एक छोटा सा अनुमंडल शाहपुर पटोरी इसका जीवंत उदाहरण है। यहाँ के लोग असाधारण रूप से प्रतिभाशाली और राजनीतिक रूप से बेहद सजग हैं। सजगता का आलम यह है कि कंधे पर रखे गमछे के रंग से ही व्यक्ति की पूरी राजनीतिक विचारधारा और मानसिकता का एक्स-रे कर दिया जाता है। किसी से सामाजिक या धार्मिक संवाद शुरू करने से पहले, कलाई के कलावा या गले के लाल धागे को देखकर बातचीत की रूपरेखा तय होती है।

जो गमछा कभी भारतीय संस्कृति की सहज पहचान और 'श्रम' का प्रतीक हुआ करता था, आज वह 'ध्रुवीकरण' का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। यह बदलाव केवल परिधान का नहीं, बल्कि हमारी चेतना के संकुचित होने का प्रमाण है।

हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के संदर्भ से उभरा एक नया शब्द "कॉकरोच" (जो उन लोगों के लिए प्रयुक्त हुआ जो किसी खास रंग या खेमे के प्रतीक को कंधे पर नहीं ढोते) लोकतंत्र के एक नए विमर्श को जन्म देता है। यह वह वर्ग है जो बिना किसी पूर्वाग्रह के व्यवस्था को देखता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वर्ग कभी उस व्यवस्था से पूछ पाता है कि—"माई लॉर्ड, समय पर न्याय कितने लोगों को मिला?" आज भी न्यायपालिका में "कॉलिजियम सिस्टम" (Collegium System) बहस का मुख्य मुद्दा बना हुआ है, जहाँ बंद कमरों में न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादले तय होते हैं। लोकतंत्र के इस पावन मंदिर में राजतंत्र जैसी यह अपारदर्शी व्यवस्था आज भी आम जनता के लिए एक अनुत्तरित सवाल है। जब न्यायपालिका में जवाबदेही की कमी होती है, तो इसका सीधा असर देश के आर्थिक और सामाजिक विकास पर पड़ता है। चूँकि कुर्सी पर बैठकर कहे गए शब्द संवैधानिक और कानूनी मान लिए जाते हैं, इसलिए इस व्यवस्था पर उंगली उठाना भी आसान नहीं होता।

एक तरफ देश के मुखिया वैश्विक पटल पर अन्य राष्ट्राध्यक्षों के साथ मधुर संबंध (जैसे हालिया 'मेलोडी' कूटनीति) बनाकर निवेश और भारत की छवि को मजबूत करने का पुरजोर प्रयास कर रहे हैं। वैश्विक मंच पर भारत का यह बढ़ता कद कितना कारगर होगा ये तो भविष्य तय करेगा लेकिन विरोधाभास देखिए कि जहाँ एक तरफ हम 'विश्वगुरु' बनने की राह पर हैं, वहीं दूसरी तरफ कोरोना महामारी के बाद पैदा हुए वैश्विक और घरेलू संकटों के बीच कुछ बुनियादी सवाल आज भी अनुत्तरित हैं।

महामारी के बाद भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश को आत्मनिर्भरता के ठोस कदम उठाने चाहिए थे, लेकिन हमारी ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा राज्यों के चुनावों में नेताओं के पसीने बहाने में चला जाता है। सवाल उठता है कि क्या स्थानीय नेतृत्व इतना कमजोर है कि उसे हर छोटे-बड़े चुनाव के लिए केंद्रीय चेहरों की बैसाखी चाहिए? और चुनाव जीतने के बाद भी, देश का पहला मुद्दा 'विकास' होना चाहिए या 'जांच एजेंसियों की कार्रवाई'?

आज राजनीति 'नीतियों' (Policies) पर नहीं, बल्कि 'मुफ्त की रेवड़ियों' (Freebies) पर टिकी है। जनता को दीर्घकालिक और सम्मानजनक रोजगार देने के बजाय तात्कालिक मुफ्त राशन या भत्तों का आदी बनाया जा रहा है, जो देश के आर्थिक भविष्य के लिए एक धीमा जहर है।

इस राजनीतिक तमाशे की सबसे बड़ी कीमत देश की युवा पीढ़ी चुका रही है। जिस शिक्षा व्यवस्था को राष्ट्र निर्माण की रीढ़ होना चाहिए था, वह आज डिग्री बांटने वाली मशीनरी और राजनीति का अखाड़ा बनकर रह गई है। परीक्षाओं के समय पर न होने, आए दिन पेपर लीक होने के घोटालों और रोजगार के अवसरों की भारी कमी ने हमारे नौजवानों के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

जो युवा कभी ज्ञान और नवाचार (Innovation) के दम पर देश को दिशा देने का सपना देखते थे, आज वे इस व्यवस्था की लाचारी के कारण अवसाद (Depression) और गहरे मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं।

जब कोई पढ़ा-लिखा युवा खुद को इस राजनीतिक चक्रव्यूह में असहाय पाता है, तो उसका व्यवस्था से भरोसा उठ जाता है। वह या तो डिग्रियों की फाइल दबाए डिप्रेशन का शिकार हो रहा है, या फिर अपनी मानसिक अशांति को शांत करने के लिए सोशल मीडिया की उस अंधाधुंध नफरत का हिस्सा बन जाता है जिसे राजनीतिक दल अपनी ईंधन की तरह इस्तेमाल करते हैं। युवाओं की इस मानसिक ऊर्जा का राजनीतिकरण देश की सबसे बड़ी त्रासदी है।

इस पूरे परिदृश्य में लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली मीडिया भी सत्ता के साथ एक सहजीवी (Symbiotic) संबंध में नजर आती है, जहाँ देश को नई दिशा दिखाने के बजाय केवल विमर्श को भटकाने का प्रयास अधिक दिखता है।

आज के डिजिटल युग में इस भटकाव को "सोशल मीडिया इको-चेम्बर" से और हवा मिल रही है। एल्गोरिदम इस तरह तय किए जा रहे हैं कि एक विचारधारा के व्यक्ति को केवल उसी से जुड़ी बातें दिखें। नतीजा यह है कि समाज में स्वस्थ संवाद खत्म हो रहा है और केवल 'वैचारिक कट्टरता' बच रही है। तार्किकता को 'ट्रेंड्स' के नीचे दफना दिया गया है।

इतिहासकारों और विचारकों ने इस तरह की व्यवस्था को हमेशा संदेह की नजर से देखा है:

अरस्तू ने इसे 'मूर्खों का शासन' कहा था, जहाँ यदि अयोग्य या अशिक्षित लोगों की संख्या अधिक होगी, तो शासन की बागडोर उन्हीं के हाथ में होगी।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने और तीखा प्रहार करते हुए कहा था— "लोकतंत्र मूर्खों का, मूर्खों के लिए और मूर्खों द्वारा शासन है।"

थॉमस लव पीकॉक के अनुसार— यह एक ऐसी व्यवस्था है जो मूर्खों की कीमत पर धूर्तों (चालाकों) को फायदा पहुँचाती है।"

इस बहुसंख्यक वैचारिक भीड़ के बीच, वह 'कॉकरोच' वर्ग (जिसे व्यवस्था अदृश्य या महत्वहीन मानती है) सबसे ज्यादा पिसता है। उसकी संख्या कम है, उसके पास कोई 'रंगीन गमछा' नहीं है, और न ही वह किसी संगठित वोटबैंक का हिस्सा है। इसलिए बजट से लेकर योजनाओं तक, हर जगह टैक्स भरने वाले इस मध्यमार्गी प्रबुद्ध वर्ग को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

भले ही व्यवस्था इस वर्ग को हाशिये पर रखे, लेकिन यह वर्ग मानसिक और बौद्धिक रूप से बेहद मजबूत, जुझारू और जीवंत है। यह वह वर्ग है जो विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहना, संघर्ष करना और आगे बढ़ना जानता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि इस निष्पक्ष, वैचारिक और जागरूक वर्ग का हर व्यक्ति, वह जहाँ भी है, जिस भूमिका में भी है, वहीं से पूरीनिष्ठा के साथ अपने लक्ष्यों की ओर दौड़ लगाए। व्यवस्था के शोर, पेपर लीक की हताशा और सोशल मीडिया के प्रोपेगैंडा से विचलित हुए बिना, अपनी बौद्धिक क्षमता के बल पर आगे बढ़ें।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बदलाव हमेशा भीड़ से नहीं, बल्कि एक ठोस विचार से शुरू होता है।

पूरा विश्वास है कि यह जागरूक वर्ग न केवल अपने व्यक्तिगत लक्ष्यों को प्राप्त करेगा, बल्कि आने वाले समय में इस लोकतंत्र को सही मायने में दिशा और दशा देने का काम भी करेगा। जब यह वर्ग अपनी चुप्पी तोड़ेगा और मानसिक अवसाद को पछाड़कर अपनी बौद्धिक क्षमता का प्रदर्शन करेगा, तभी शाहपुर पटोरी से लेकर दिल्ली के लुटियंस जोन तक एक वास्तविक वैचारिक क्रांति का उदय होगा।

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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