शाहपुर पटोरी की कलम से: व्यवस्था के नाम एक खुला खत
"दुकानें बंद हैं, बाज़ार ख़ामोश हैं मगर शोर गहरा है,तिजोरियां भर रहीं जिनकी, उनकी आंखों पर पहरा है।"
यह पंक्तियां आज देश के उस रीढ़ की हड्डी यानी छोटे और मझोले व्यापारियों की अंतरात्मा की आवाज़ हैं, जो टैक्स भी ईमानदारी से चुकाते हैं और हर बदलती सरकारी नीति की पहली मार भी सहते हैं।
बीते दिन शाहपुर पटोरी से लेकर पूरे भारत के ड्रग एसोसिएशन के आह्वान पर दवा दुकानदारों की 24 घंटे की देशव्यापी बंदी पूर्ण रूप से सफल रही। यह बंदी सिर्फ शटर गिराने का प्रतीक नहीं थी, बल्कि यह सरकार की नीतियों और व्यवस्था में पनप रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मौन आक्रोश का शंखनाद था।
जब देश में 'एक देश, एक टैक्स' यानी GST (वस्तु एवं सेवा कर) लागू किया जा रहा था, तब शाहपुर पटोरी के चौक-चौराहों से लेकर देश के बड़े व्यापारिक गलियारों तक एक उम्मीद जगी थी। लगा था कि इंस्पेक्टर राज खत्म होगा, व्यापार सुगम होगा और इसका सीधा फायदा आम जनता और छोटे व्यापारियों को मिलेगा।
लेकिन आज एक लंबा अंतराल बीत जाने के बाद आम आदमी और छोटा व्यापारी खुद से यही सवाल पूछ रहा है "क्या हमारा भला हुआ?" यह सवाल आज भी एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है। आम जनता और व्यापारियों को राहत मिली या नहीं, यह तो बहस का विषय हो सकता है, लेकिन सरकारी तिजोरी हर महीने रिकॉर्ड तोड़ जीएसटी कलेक्शन से भारी होती जा रही है। दुख इस बात का है कि जनता के खून-पसीने की इस कमाई का एक बड़ा हिस्सा चुनावी रेवड़ियों और राजनीतिक फायदों के लिए खुलकर बहाया जा रहा है।
दवा दुकानदारों की बंदी इसलिए भी शत-प्रतिशत सफल रही क्योंकि चिकित्सा क्षेत्र का अपना एक मजबूत संगठन है। लेकिन इस बंदी के पीछे की एक स्याह हकीकत 'ऑफ द कैमरा' (कैमरे के पीछे) दुकानदारों ने बयां की। शाहपुर पटोरी से लेकर राज्य की राजधानी तक, छोटे-बड़े दवा दुकानदारों को अपनी क्षमता के अनुसार एक निश्चित रकम तय करनी पड़ती है। साल में दो बार दलालों (एजेंटों) के माध्यम से यह पैसा जिले के ड्रग इंस्पेक्टरों तक पहुंचता है।
यह सारा खेल सिर्फ इसलिए खेला जाता है ताकि औचक निरीक्षण (Surprise Inspection) न हो, और अगर कोई जांच होनी भी हो, तो उसकी जानकारी पहले ही मिल जाए। बड़े ही "ईमानदार" तरीके से यह रिश्वतखोरी चलती है ताकि कोई निरीक्षण हो ही न। व्यापारी मजबूरी में यह दर्द झेलते हैं क्योंकि उन्हें शांति से व्यापार करना है। दवा दुकानदारों के पास तो फिर भी एक मजबूत एसोसिएशन है जो उनकी आवाज उठाता है, लेकिन उन किराना, कपड़ा और अन्य छोटे दुकानदारों का क्या, जिनका कोई मजबूत संगठन नहीं है? वे इस भ्रष्टाचार की चक्की में अकेले पीस रहे हैं।
पारंपरिक दवा के साथ सभी व्यापारियों सामने आज सबसे बड़ा संकट ई-फार्मेसी (E-Pharmacy) और ऑनलाइन मार्केटिंग का है। बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां भारी डिस्काउंट और घर बैठे दवा या अन्य सामान पहुंचाने की सुविधा देकर पारंपरिक दुकानदारों के पेट पर लात मार रही हैं।
एक बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि जो छोटा दुकानदार किसी दवा पर बमुश्किल 10% से 20% की छूट दे पाता है, वहीं ये ऑनलाइन कंपनियां 20% से 50% तक की छूट कैसे दे देती हैं?
क्या यह सीधे तौर पर छोटे व्यापारियों को बाजार से खत्म करने की एक सोची-समझी रणनीति नहीं है? छोटे व्यापारी और उनके यहां काम करने वाले कर्मचारी देश के रोजगार का मुख्य जरिया हैं। अगर यह रीढ़ टूट गई, तो बेरोजगारी का संकट पहले से कहीं ज्यादा भयावह हो जाएगा।
MRP (अधिकतम खुदरा मूल्य) का मायाजाल और रोज़ के झगड़े:
आज खुदरा दुकानदारों और ग्राहकों के बीच रोज़ होने वाली तीखी बहस की मुख्य वजह है—MRP का गलत निर्धारण है ।
GST की मौजूदा पॉलिसी में वस्तुओं के मूल्य निर्धारण को लेकर भारी विसंगतियां (गलतियां) हैं:
कई गैर-ब्रांडेड सामानों पर लागत से 10 गुना या उससे भी ज्यादा MRP प्रिंट होती है। कंपनियां ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को भारी डिस्काउंट देने के लिए ऐसा खेल खेलती हैं, जिससे आम ग्राहक को लगता है कि लोकल दुकानदार उसे लूट रहा है।
कुछ वस्तुओं पर MRP उतनी ही प्रिंट होती है, जितनी कीमत पर रिटेलर उसे खरीदता है। अब सवाल यह है कि दुकानदार उसे किस दाम पर बेचे और अपना घर कैसे चलाए?
कई सामानों पर MRP प्रिंट ही नहीं होती, जो कि नीतिगत रूप से बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
शाहपुर पटोरी की धरती से प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से सीधे सवाल:
MRP की सीमा कौन तय करेगा?
क्या किसी वस्तु पर उसकी वास्तविक लागत से 10 गुना ज्यादा दाम छापना जायज है?
सरकार इस पर लगाम क्यों नहीं लगाती?
जब प्रिंट रेट ही खरीद रेट के बराबर होगा, तो खुदरा दुकानदार ग्राहकों से किस मुंह से पैसे मांगेगा? क्या सरकार उन्हें व्यापार बंद करने पर मजबूर करना चाहती है?
कुछ वस्तुओं पर बिना MRP के बिक्री की छूट देकर उपभोक्ताओं और दुकानदारों को भ्रम में क्यों रखा जा रहा है?
सरकार और जनता का रिश्ता क्या है?
क्या भारत सरकार का काम सिर्फ जनता की गाढ़ी कमाई से अपना खजाना भरना है? क्या एक लोकतांत्रिक देश की सरकार और उसके नागरिकों के बीच सिर्फ एक 'दुकानदार और ग्राहक' का व्यावसायिक रिश्ता रह गया है?
यह लेख किसी की आलोचना के लिए नहीं, बल्कि सरकार को समय रहते सचेत करने के लिए है। दवा दुकानदार ही नहीं, बल्कि देश का हर छोटा-बड़ा व्यापारी इस अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ है। सरकार को इन विसंगतियों पर, MRP के खेल पर और ई-कॉमर्स के कारण छोटे व्यापारियों के हो रहे नुकसान की गंभीरता से समीक्षा करनी होगी।
यह 24 घंटे की बंदी महज़ एक संकेत है, एक छोटा सा ट्रेलर है। अगर समय रहते सरकार ने छोटे व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में यह असंतोष एक बहुत बड़े राष्ट्रव्यापी आंदोलन का रूप ले सकता है। शाहपुर पटोरी की कलम आज देश के नेतृत्व से जवाब मांगती है!
अंत में दो लाइन के साथ आपको छोड़े जा रहा हूं ।
"लूट रहे हैं चंद मुनाफ़ाखोर सियासत की छांव में,कारोबार सिमट रहा शहरों का, चूल्हा बुझ रहा गांव में।"
मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT