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जनकल्याणकारी योजना के नाम पर धन की बर्बादी ।

हमारे देश और राज्यों में जनकल्याणकारी योजनाओं का निर्माण नागरिकों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने, सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने और समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है। इन योजनाओं को संचालित करने के लिए जो विशाल बजट आवंटित होता है, वह किसी सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि देश के आम करदाताओं (Tax Payers) की गाढ़ी कमाई से आता है। यह पैसा नागरिक का देश के भविष्य पर किया गया निवेश है। इसलिए, इस 'जन-पूंजी' का एक-एक पैसा सही जगह और सही तरीके से खर्च होना जनहित का मूल मंत्र है।

दुर्भाग्य से, कई बार जनकल्याण योजनाओं के क्रियान्वयन में धन की बर्बादी और दुरुपयोग की शिकायतें सामने आती हैं। यह बर्बादी कई रूपों में हो सकती है:
1. निष्क्रिय योजनाएं:-ऐसी योजनाएं जो कागज़ों पर तो हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका कोई असर नहीं दिखता।
2. मध्यस्थों की भूमिका (Leakage):-योजना का लाभ सीधे लाभार्थी तक न पहुँचकर बीच के बिचौलियों द्वारा हड़प लिया जाना।
3. खराब परियोजना प्रबंधन:- परियोजनाओं को पूरा होने में अत्यधिक विलंब होना, जिससे लागत कई गुना बढ़ जाती है (Cost Overruns)।

4. गुणवत्ता से समझौता:-निर्माण कार्यों या सेवाओं में घटिया सामग्री का उपयोग, जिससे वह टिकाऊ नहीं रहती और बार-बार मरम्मत की आवश्यकता पड़ती है।

इस तरह की बर्बादी, जिसे अक्सर "कल्याण योजना के नाम पर पैसों की बर्बादी" कहा जाता है, सीधे तौर पर आम नागरिक के विश्वास को ठेस पहुंचाती है और देश के विकास की गति को धीमा करती है।

यदि योजना का पैसा ईमानदारी और दक्षता के साथ खर्च किया जाए, तो इसके चमत्कारी परिणाम सामने आ सकते हैं। यही वह बिंदु है जहाँ धन का सदुपयोग सीधा जनहित में परिवर्तित होता है:

1. डिजिटलीकरण:-डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) जैसी तकनीकों का उपयोग करके पैसे को सीधे लाभार्थी के खाते में भेजना, जिससे लीकेज (रिसाव) रुकता है।
2. सार्वजनिक ऑडिट:-योजनाओं के खर्च का ब्यौरा सार्वजनिक करना और नागरिक समूहों को इसकी निगरानी (Social Audit) करने का अधिकार देना।
3. डेटा-आधारित निर्णय:-योजना बनाते समय केवल राजनीतिक हितों को नहीं, बल्कि वास्तविक आवश्यकताओं, सांख्यिकीय डेटा और सर्वे परिणामों को आधार बनाना।

बुनियादी ढाँचा:-सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत और दीर्घकालिक जनहितकारी क्षेत्रों में निवेश को प्राथमिकता देना। ये निवेश एक स्थायी आधार प्रदान करते हैं।

लक्ष्य-केंद्रित योजना:-केवल उन्हीं लोगों को लाभ पहुंचाना जो वास्तव में गरीब और जरूरतमंद हैं, ताकि संसाधन सही दिशा में लगें।

समयबद्धता:-परियोजनाओं को निश्चित समय सीमा के भीतर और तय लागत के अंदर पूरा करने की सख्त नीति बनाना।

गुणवत्ता नियंत्रण:-सरकारी कार्यों और सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए मजबूत निरीक्षण और दंड प्रणाली स्थापित करना।

करदाताओं का पैसा राष्ट्र निर्माण की धुरी है। यदि यह धन ईंधन की तरह अर्थव्यवस्था में सही जगह प्रवाहित होता है, तो यह मजबूत स्कूल, बेहतर अस्पताल, टिकाऊ सड़कें और लाखों नागरिकों के लिए सशक्तिकरण का माध्यम बनता है।

और यह केवल सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी नहीं है; यह हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह जागरूक रहे, सवाल पूछे और अपने पैसे के सही इस्तेमाल की माँग करे। जब जनता और सरकार मिलकर पारदर्शिता सुनिश्चित करते हैं, तभी 'कल्याण योजना' सही मायने में 'जन-कल्याण' बन पाती है और एक समृद्ध, सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण संभव होता है।

मनीष सिंह
शाहपुर पटोरी
@ManishSingh_PT

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