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नौजवानों के हित में इस नियम में तो होना ही चाहिए बदलाव

माननीय न्यायालय के निर्णय पर तो मुझे कुछ नहीं कहना है और सरकार की नीति पर भी मुझे कोई ऐतराज नहीं है। लेकिन किसी भी प्रकार की परीक्षा में दो लोगों के सामान्य अंक आने पर ज्यादा उम्र वाले को मौका दिए जाने का जो नियम दर्शाया जा रहा है। मुझे लगता है कि वो समयानुकुल नहीं है। इससे युवाओं में हीन भावना पैदा होने और बेरोजगारी बढ़ने का खतरा पैदा होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश के अधिनस्थ न्यायालय में स्टेनोग्राफर भर्ती परीक्षा 2017 परिणाम में  समान अंक पाने वाले दो अभ्यर्थियों में से उम्र में बड़े अभ्यर्थी को नियुक्ति देने के निर्णय को सही करार दिया है। कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इंकार करते हुए कहा है कि यदि पद रिक्त हो तो दूसरे अभ्यर्थी को भी नियुक्ति देने पर विचार किया जाए। यह आदेश न्यायमूर्ति  अश्वनी कुमार मिश्र ने धर्मेन्द्र कुमार सरोज की याचिका को निस्तारित करते हुए दिया है।
याची का कहना था कि अनुसूचित जाति कोटे का कट आॅफ अंक 158.28 घोषित किया गया।याची को भी इतना ही अंक मिला। किन्तु उसे चयनित नहीं किया गया।क्योंकि याची से उम्र में बड़े अभ्यर्थी को भी इतने ही अंक मिले थे।विज्ञापन के क्लाज 11में समान अंक की दशा में उम्र में बड़े को वरीयता देने का नियम है।जिसके कारण दूसरे अभ्यर्थी का चयन हो गया।याची ने कोर्ट की शरण ली। कोर्ट ने चयन को सही माना और कहा कि पद खाली हो तो याची के भी चयन पर विचार किया जाए।
बताते हैं कि ऐसे मामलों में एक ही तारीख पर जन्म होने के बाद भी नाम में जो शब्द पहले आता है कि उसमें एक ही नाम से जुड़े व्यक्ति को प्राथमिकता मिल जाती है। होना तो यह चाहिए कि या तो एक समान अंक लाने वालों से कोई एक ऐसी परीक्षा कराई जाए जो तुरंत हो सके और उसमें जो सफल हो उसे मौका मिले वरना जो रह गया उसे कहीं और उसी समय समाहित किया जाए। क्योंकि एक बच्चे की पढ़ाई कराने में बहुत से परिवारों की सारी व्यवस्थाएं ध्वस्त हो जाती है और काम ना मिलने पर परिवार के परिवार बर्बादी के कगार पर पहुंच जाते हैं। ऐसे में कुछ पीड़ित युवा गलत रास्ता भी चुन लेते हैं जो समाज के लिए आगे चलकर काफी नुकसानदायक होता है।
जब यह कानून बने होंगे तब कि बात और है लेकिन जब केंद्र सरकार द्वारा पुराने कानूनों में बदलााव किया जा रहा है ऐसे में इस नियम में भी जनहित को देखते हुए बदलाव किया जाना चाहिए। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हमेशा सबके साथ इंसाफ करने और उन्हें न्याय दिलाने का भरोसा दिया जाता है। उसे ध्यान में रखते हुए भी समान अंक पाने पर बड़ी उम्र के अभ्यार्थियों को मौका देने के नियम में वक्त की मांग समझकर बदलाव होना चाहिए। देश के गांवों में एक कहावत बड़ी प्रचलित है कि जब तक बच्चा रोता नहीं तब तक मां भी दूध नहीं पिलाती और भूखे पेट भजन न होए गोपाला। दूसरी कहावत में तो यह कह सकते हैं कि भूखा तो न्याय के लिए लड़ने की सामर्थय भी नहीं जुटा पाता है लेकिन पहली कहावत को ध्यान में रखते भावी पीढ़ी को बढ़ावा देने की बात करने वालों के साथ ही आरटीआई कार्यकर्ताओं और सूचना का अधिकार के माध्यम से आम आदमी के हित की बात करने वालों को इस मामले मंे माननीय न्यायालय में जनहित याचिका तथ्यों के आधार पर दायर कर पात्र नौजवानों का हक उन्हें दिलाने का प्रयास उन्हें करना ही चाहिए।

– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com


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