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तीरा कामत के बाद ईशानी और रियांश, आम आदमी कहां से लाएगा करोड़ों ईलाज के लिए, सरकार और दवा कंपनी करे और ज्यादा टीके की निःशुल्क व्यवस्था

बच्चा या बूढ़ा गरीब का हो या अमीर का सबको प्यारा होता है और आदमी कोशिश करता है कि कुछ भी क्यों न करना पड़े अपने सुखी रहें। लेकिन जैसे जैसे स्वास्थ्य संबंधित जानकारियां और बीमारियों का विवरण प्रकाश में आ रहा है वैसे यह स्पष्ट हो रहा है कि भगवान अगर प्रसन्न रहे तो सब ठीक है वरना एडस, कैंसर, टीबी से भी खतरनाक ऐसी बीमारियों के नाम उभरकर आ रहे हैं जो आम आदमी ने कभी नहीं सुने थे और जिनका ईलाज अपना घर और संपत्ति बेचने के बाद भी ग्रामीण कहावत अपने को गिरवी रखकर भी उनका इलाज करा पाना संभव नहीं है। 

लेकिन सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को एक उपलब्धि के रूप में देखे तो कुछ ऐसी बीमारियां है जिनके इलाज का एक एक टीका 22 करोड़ का होता है और इस पर आम आदमी से आग्रह कर कुछ के ईलाज के लिए तो पैसा जुट जाता है लेकिन सबको शायद मदद मिल पाना संभव नहीं कह सकते। बंबई के तीराकामत के बाद दिल्ली निवासी रेयांस की बीमारी के बाद अब मेरठ शहर के ब्रह्मपुरी में मास्टर कालोनी गली नंबर तीन निवासी अभिषेक शर्मा की पुत्री ईशानी के ईलाज के लिए 22 करोड़ का टीका लगना बताया जाता है।

यह कहां से आएगा यह अभी तय नहीं है लेकिन जानकार कहते हैं कि सोशल मीडिया पर अभियान चलेगा। मगर सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसे अभियानों से किस किस के ईलाज के लिए कौन कितना पैसा दे सकता है। इस बारे में भी चिंतन की आवश्यकता है। मेरठ निवासी 31 वर्षीय शुभम को जीवनदान देने के लिए उनकी मां अपने बेटे को किडनी देने को तैयार है लेकिन उस पर खर्च होने वाले सात लाख रूपये जुटाने हेतु अभियान चल रहा है। यह रकम जुट भी जाएगी लेकिन 22 करोड़ की रकम कोई कम नहीं होती। बताते हैं कि स्विटजरलैंड में बनने वाले टीके की कीमत 16 करोड़ रूपये है और 6 करोड़ रूपये भारत  आने पर टैक्स लगता है। मेरा मानना है कि ऐसी दुर्लभ बीमारियों के ईलाज हेतु दवाई बनाने वाली कंपनियों से हमारी सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय संपर्क कर कुछ ऐसी व्यवस्थाएं  कराएं कि जितने टीकों का निर्माण इनकी उत्पादक कंपनियों द्वारा किए जाते हैं उनका 10 प्रतिशत वो निशुल्क रूप से  गरीब और मध्यम परिवारों से जुड़े  लोगों के ईलाज के लिए उपलब्ध कराए और सरकार को भी छह करोड़ टैक्स को पूरी तौर पर छोड़ना चाहिए तभी कुछ का ईलाज हो सकता है और ऐसा कोई गलत भी  नहीं है। मानवीय दृष्टिकोण से यह व्यवस्था दवा कंपनियों और सरकार को करनी चाहिए। 


क्योंकि आए दिन टीवी चैनलों पर कुपोषित बच्चों के ईलाज हेतु एक विज्ञापन दिखाया जाताा है जिसमें मोबाइल नंबर देकर नागरिकों से आग्रह किया जाता है कि आप कुपोषित बच्चों के इलाज के लिए 800 रूपये प्रति माह अनुदान दे। यह इस बात का प्रतीक है कि कई बातों के लिए आज हम दानवीरों की ओर निहार रहे हैं लेकिन सहायता देने वाले की भी एक सीमा है इसलिए हमें अलग से भी कुछ व्यवस्थाएं करनी होगी। 

बताते चलें कि मुंबई की तीरा कामत के बाद मेरठ में डेढ़ साल की बच्ची ईशानी को दुनिया की दुर्लभ बीमारियों में से एक स्पाइनल मस्क्युलर अट्राॅफी (एसएमए) टाइप-2 की पुष्टि हुई है। इसका इंजेक्शन टैक्स सहित 22 करोड़ रुपये का बताया गया है। मध्यमवर्गीय परिवार ने आर्थिक मदद के लिए सोशल मीडिया पर मदद मांगी है। ईशानी मेरठ में ब्रह्मपुरी थाना क्षेत्र में मास्टर काॅलोनी में रहती है। उसके पिता अभिषेक शर्मा दिल्ली की लाॅजिस्टिक कंपनी में 25 हजार रुपये वेतन पर नौकरी करते हैं। मां नीलम वर्मा गृहणी हैं। अभिषेक के अनुसार, ईशानी जब नौ महीने की थी, तभी उसके पैरों ने काम करना बंद कर दिया। वह खड़ी नहीं हो पाती थी। डाॅक्टरों को दिखाया तो उन्होंने कैल्शियम की दवाएं दीं लेकिन आराम नहीं हुआ। धीरे-धीरे उसके हाथों ने भी काम करना बंद कर दिया।

वह बच्ची को लेकर दिल्ली के गंगाराम हाॅस्पिटल में पहुंचे। 26 दिसंबर 2020 को उसका ब्लड सैंपल लिया। 12 जनवरी 2021 को रिपोर्ट आई। इसमें स्पाइनल मस्क्युलर अट्राॅफी (एसएमए) टाइप-2 की पुष्टि हुई। इस रिपोर्ट के आधार पर एम्स दिल्ली में ईशानी के केस को रजिस्टर कर लिया गया है। उसका इलाज अब एम्स में होगा।
स्विटजरलैंड में बनता है टीका
स्विटजरलैंड की कंपनी नोवार्टिस इस टीके को बनाती है, जिसका नाम जोलगेन्समा है। इस इंजेक्शन की कीमत 16 करोड़ रुपये है। करीब छह करोड़ रुपये टैक्स देना पड़ेगा। इस प्रकार यह इंजेक्शन 22 करोड़ का बैठेगा। इसे अमेरिका से भी मंगवाया जा सकता है।
लकी ड्राॅ टीके के लिए रजिस्ट्रेशन
टीका बनाने वाली स्विटरलैंड की कंपनी हर साल 50 लोगों को मुफ्त टीका लगाती है। इन 50 लोगों का चयन लकी ड्राॅ से होता है। ईशानी का रजिस्ट्रेशन लकी ड्राॅ के लिए कर दिया गया है। अब उसकी किस्मत है कि लकी ड्राॅ में नंबर आता है या नहीं।

मासूम को यह है बीमारी
शरीर में प्रोटीन बनाने वाला जीन नहीं होता तो स्पाइनल मस्क्युलर अट्राॅफी (एसएमए) बीमारी होती है। मांसपेशियां, तंत्रिकाएं खत्म होने लगती हैं। दिमाग की मांसपेशियों की सक्रियता कम होने लगती है। सांस लेने व भोजन चबाने में भी दिक्कत होती है। यह एक न्यूरो मस्क्युलर डिसआॅर्डर है, जो जेनेटिक बीमारी है। कुल मिलाकर इंसान का शरीर कोई मूवमेंट नहीं कर पाता।

मदद को कैंपेन शुरू
ईशानी के पिता अभिषेक वर्मा का कहना है कि उनके पास इतने पैसे नहीं हैं जो बच्ची का इलाज करा सकें। लोगों से आर्थिक मदद की अपील की है। मिलाप, इम्पैक्ट गुरु जैसी वेबसाइट्स पर प्रोफाइल डालकर लोगों से मदद को कहा है। पिछले चार दिन में एक लाख रुपये चंदा एकत्र हो गया है।

नवजात रेयांश को सबसे खतरनाक बीमारी
नौ माह के रेयांश सूरी को स्पाइनल मस्क्युलर अट्राॅफी (एसएमए) टाइप-1 की पुष्टि हुई है। टाइप-1 सबसे खतरनाक माना जाता है। रेयांश के नाना डाॅ. अशोक अरोड़ा मेरठ में डिप्टी सीएमओ रहे हैं। फिलहाल वह मोदीपुरम में रहते हैं। रेयांश के पिता मनीष सूरी व मां रुद्राशी दिल्ली में रहते हैं। रेयांश के परिजनों ने भी फंड जुटाने के लिए क्राउड फंडिंग प्लेटफाॅर्म का सहारा लिया है।
यह इस विवरण को देखकर कोई भी आसानी से यह अंदाज  लगा सकता है कि इन खतरनाक बीमारियों के इलाज पर जो धन खर्च होना है। अगर इनका टीका बनाने वाली कंपनियों और सरकार ने समय रहते 50 प्रतिशत टीके मुफ्त के अलावा कोई निर्णय नहीं लिया और इनके इलाज पर जो पैसा खर्च और दान दिया गया और बाकी  पैसे के अभाव में अन्य बीमारियों से मरने वालों और कुपोषित बच्चों के जो मार्ग अभी खुले हुए हैं उनमें बाधा उत्पन्न हो सकती है। लेकिन दुनियाभर में दान दाताओं की भी कोई कमी नहीं है। हमारे दानवीर करोड़ों करोड़ो रूपये धार्मिक स्थानों में दान करते हैं। मुझे लगता है कि इतने सरकार और दवा कंपनी कोई निर्णय ले इन बीमारियों से ग्रस्त बच्चों और कुपोषितो को बचाने के लिए मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण दानवीरों को आगे आकर जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए। कहीं सुना था कि अपने देश में ऐेसे ऐसे धनवान हैं जो सारा कर्ज चुकता कर सकते हैं। अगर यह सही है तो उन्हें आम आदमी के अपनों को बचाए रखने के प्रयासों को मजबूती देने हेतु मदद के हाथ जल्द से जल्द बढ़ाने चाहिए।

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