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हरिओम आनंद प्रकरण: ऐसे तो कोई किसी की मदद नहीं करेगा, आगे बढ़ने और कुछ करने की इच्छा रखने वाले नौजवानों का क्या होगा

आनंद अस्पताल के मालिक हरिओम आनंद के बारे में कहा जाता है कि वो निहायत मिलनसार और दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहने वाले व्यक्तित्व के स्वामी थे। और जीवनभर शायद सुभारती के संचालक डाॅ अतुल कृष्ण के अतिरिक्त उनका किसी से कोई बड़ा मनमुटाव भी शायद नहीं रहा। यह कारण भी उनकी तरक्की और प्रगति की एक वजह हो सकती है, क्योंकि शुरूआती दौर से अंतिम समय तक उन्होंने जिनसे से भी जैसे भी धन लिया परेशानियां होने के बावजूद स्पष्ट रूप से किसी से भी उसे वापस करने से इंकान नहीं किया गया। जानकारों का यह कहना भी सही लगता है कि इसीलिए उन्हें हमेशा पैसे की कमी नहीं रही और उन्होंने इसी वजह से इतना बड़ा अस्पताल खड़ा कर लिया।

जानकारों का कहना है कि 500 करोड़ का बैंक का कर्ज और करोड़ों रूपये का कर्ज उनके मिलने वालों का उन पर था। हो सकता है कि देने के समय कुछ परेशानी महसूस हो रही हो लेकिन ऐसी शायद कोई बात तथ्यों के साथ उभरकर नही आई है कि उन्होंने 27 जून 2020 को इससे परेशान होकर आत्महत्या की हो। बीते लगभग नौ माह की जांच में कई उतार चढ़ाव आरोप प्रत्यारोप लगते और लगाए जाते रहे, मगर उनका उत्पीड़न किए जाने की बात उनकी पुत्री द्वारा लिखित में पुलिस से की गई जिस पर एसपी सिटी ने भी जांच की और एसआईटी से भी विवेचना कराई गई। पिछले दो दिन से इस प्रकरण में चार्चशीट लग जाने और जांच हापुड़ पुलिस को सौंप दिए जाने को लेकर चर्चा चल रही है। जांचकर्ता अधिकारी वरूण शर्मा के हवाले से छपी खबरों से स्पष्ट हो रहा है कि सुसाइड नोट के हस्ताक्षर फर्जी और उत्पीड़न के सुबूत भी नहीं मिले हैं।

इस प्रकरण में सुभारती गु्रुप के चेयरमैन डाॅ अतुल कृष्ण उनकी पत्नी मुक्ति भटनागर, अस्पताल के शेयर धारक जीएस सेठी, डाॅ ललित भारद्वाज, राहुल दास, समय सिंह सैनी, मुमताज आदि समेत नौ लोगों को आधार बनाकर जांच हुई। इसमें अभी तक जितने भी आरोप लगाए गए थे शायद वो स्पष्ट नहीं हुए हैं। मानसी आनंद ने एडीजी पुलिस राजीव सब्बरवाल से शिकायत की। उन्होंने आईजी प्रवीण कुमार को कार्रवाई के निर्देश दिए। जांच हापुड़ एसपी नीरज जादौन को दे दी गई है। पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एफआईआर बीते बुधवार को कोर्ट भेज दी। मानसी आनंद के वरिष्ठ अधिवक्ता रामकुमार शर्मा का कहना है कि पुलिस ने आरोपी पक्ष से साज कर एफआर लगाई है। साक्ष्य संलग्न नहीं किए गए और बिंदुओं को नजरअंदाज किया गया। जबकि दूसरे पक्ष के अधिवक्ता अमित दीक्षित का कहना है कि जिस मुकदमे में एफआर लग गई उसकी जांच नहीं होती। दोबारा से विवेचना होती है या अग्रिम विवेचना।
आनंद परिवार का मानना है कि इन बिंदुओं पर क्यों नहीं हुई जांच, चर्चा
1 आनंद परिवार ने शेयर धारक और अतुल कृष्ण के खिलाफ 55 पन्नों के सुबूत दिए थे, नहीं की गई जांच
2 खुदकुशी से पहले किस-किस से हरिओम आनंद की बात हुई । कौन धमकाने के लिए उनके घर आया था। इसकी नहीं हुई जांच
3 सुसाइड नोट कंप्यूटर पर किसने टाइप किया है और हरिओम ने कब हस्ताक्षर किए या नहीं किए। सुबूत नहीं तलाशे
4 आनंद हाॅस्पिटल के डाॅक्टरों के बयान क्यों नहीं किए विवेचना में शामिल
5 हरिओम आनंद क्यों परेशान थे। मुरलीपुर गांव में जाकर अपने फार्म हाउस पर जहर क्यों खाया और ड्राइवर को क्या-क्या बताया
6 पीड़ित परिवार के बयान व सुबूत को विवेचना में क्यों शामिल नहीं किया
एफआर की मुख्य बातें इस प्रकार बताई जा रही हैं
1 हरिओम आनंद का नामजद आरोपी उत्पीड़न कर रहे थे, इसका सुबूत नहीं मिला
2 सुसाइड नोट पर हरिओम के हस्ताक्षर का नहीं हुआ मिलान
3 500 करोड़ का कर्जा बताया, जिसको लेकर घर में विवाद चल रहा था
4 मरने से पहले हरिओम ने नहीं लगाया किसी भी नामजद आरोपी पर कोई आरोप, कोई वीडियो नहीं
5 97 फीसदी शेयरधारकों का हक, तीन फीसदी आनंद परिवार का हाॅस्पिटल में था हक
इस पूरे प्रकरण में कौन दोषी है कौन नहीं इस विवाद से तो मुझे कोई मतलब नहीं है। क्योंकि ना तो मेरा इरादा किसी को क्लीन चिट देने का है और ना किसी को झूठा बताने का। लेकिन अगर पूरे प्रकरण पर नजर डाली जाए तो एकमात्र हरिओम आनंद के समक्ष समय सिंह सैनी द्वारा अपनाई गई कार्यप्रणाली के अतिरिक्त शायद किसी ने भी स्व. हरिओम आनंद से पैसों को लेकर बड़ा विवाद उत्पन्न नहीं किया। और कुछ लेनदार तो आज भी यह कहने से नहीं चूकते कि हरिओम जी अच्छे आदमी थे। किसी का पैसा मारने का उनका इरादा नहीं था।
तो कई लोगों का यह भी कहना है कि अपने जीवन में हरिओम आनंद और होटल हारमनी के संचालकों के बीच हुए लेनदेन के कारण आर्थिक स्थिति डगमगाई। सही गलत क्या है यह तो कहने वाले ही जान सकते हैं।
मगर एक बात मैं जरूर कहना चाहता हूं कि इस पूरे प्रकरण में जो कार्रवाई चल रही है उससे भविष्य में उन कई लोगों को परेशानियां होगी जो कुछ कर गुजरने का जज्बा तो रखते हैं लेकिन पैसा नहीं है। और हरिओम आनंद जी के चले जाने और इस प्रकरण के बाद अपनों को भी उधार देने में और मदद करने में लोग हिचकिचाने लगेंगे। अगर ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है कि कोई भी किसी की मदद करने या आगे बढ़ने में आर्थिक सहयोग के लिए आगे आने को तैयार नहीं होगा जिससे लोगों के व्यवसाय प्रभावित होंगे। नौजवानों को आगे बढ़ने में कठिनाई आएंगी और कोई किसी पर भी विश्वास नहीं करेगा । ऐसी स्थिति ठीक नहीं कही जा सकती है यह बात आरोप लगाने और जिन पर लग रहे हैं उन दोनों को ही सोचना होगा कि आखिर कमी कहां रही।

– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

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