उन्नाव उ.प्र. :एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है क्या अब सच उजागर करना भी अपराध माना जाएगा?
⚠️ *“हत्या का सच दिखाया… तो अब पत्रकार ही कटघरे में?”*
उन्नाव में एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—क्या अब सच उजागर करना भी अपराध माना जाएगा?
जिस पत्रकार ने एक किसान की संदिग्ध मौत के पीछे छिपी हत्या की कहानी सामने लाई, अब उसी से पुलिस जवाब मांग रही है। सवाल ये नहीं कि वीडियो कहां से आया… सवाल ये है कि आखिर पुलिस की नजर वहां तक पहले क्यों नहीं पहुंची?
मामला फतेहपुर चौरासी थाना क्षेत्र के मलतापुर सुखाखेड़ा गांव का है। 25 अप्रैल की शाम किसान मुन्नू सिंह की मौत को शुरुआती तौर पर सड़क हादसा बताकर मामला लगभग बंद करने की तैयारी थी। लेकिन गांव में चर्चा कुछ और थी। लोग इसे साधारण दुर्घटना नहीं, बल्कि संपत्ति विवाद में की गई सुनियोजित साजिश बता रहे थे।
इसी बीच भारत समाचार के संवाददाता संकल्प दीक्षित ने मामले की तह तक जाना शुरू किया। ग्रामीणों से बातचीत, घटनास्थल की पड़ताल और एक अहम वीडियो ने पूरी कहानी का रुख बदल दिया। आरोप सामने आया कि किसान को केवल ट्रैक्टर से टक्कर नहीं मारी गई, बल्कि उसके बाद मारपीट भी हुई। यानी मामला हादसे का नहीं, हत्या का था।
जब खबर चली… वीडियो सामने आया… तब जाकर पुलिस की नींद टूटी। आनन-फानन में धाराएं बढ़ीं, जांच दोबारा हुई और आरोपी जितेंद्र सिंह को हत्या के आरोप में जेल भेजा गया।
लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल पुलिस की भूमिका पर खड़ा हो रहा है।
अगर गांव वालों के पास वीडियो था…
अगर शुरू से हत्या की आशंका थी…
अगर पत्रकार जमीनी पड़ताल में सच तक पहुंच सकता था…
तो फिर पुलिस क्यों नहीं पहुंची?
और अब जबकि पत्रकारिता ने एक संभावित “सड़क हादसे” को हत्या में बदल दिया, तो कार्रवाई असली चूक पर नहीं… बल्कि उस पत्रकार पर दिखाई दे रही है जिसने सच जनता तक पहुंचाया।
सूत्रों के मुताबिक अब पत्रकार से पूछा जा रहा है कि वीडियो कहां से मिला?
तो क्या अब पुलिस की जांच पत्रकारों के स्रोतों के भरोसे चलेगी?
क्या मुखबिर तंत्र, सर्विलांस और जांच एजेंसियां सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या खोजी पत्रकारिता करने वालों को अब सरकारी नोटिसों के जरिए दबाने की कोशिश होगी?
लोकतंत्र में पत्रकारिता का काम सत्ता और सिस्टम से सवाल पूछना होता है… न कि सवाल पूछने वालों को ही कठघरे में खड़ा करना।
अगर एक पत्रकार की पड़ताल हत्या का सच बाहर ला सकती है, तो यह उपलब्धि पत्रकारिता की है… लेकिन साथ ही यह पुलिस व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल है।
सच सामने लाने वालों पर दबाव बढ़ाना आसान है…
लेकिन असली जिम्मेदारी उस सिस्टम की है जो पहली नजर में सच पहचानने में नाकाम रहा।